बरेली। रुहेलखंड विश्वविद्यालय कैंपस के क्षेत्रीय अर्थशास्त्र विभाग के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जरी-जरदोजी के क्षेत्र में एक अध्ययन किया है। अध्ययन में पाया गया है कि ये उद्योग आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, लोकल टर्नओवर में भारी गिरावट, साथ ही कारीगरों की बहुत कम मजदूरी जिससे मुश्किल से ही बेसिक जरूरतें पूरी हो पाती हैं। कच्चे माल की बढ़ती लागत (जिस पर 18% जीएसटी का और बोझ है) और सस्ती मशीन से बने विकल्पों से कड़े कॉम्पीटीशन ने इस सेक्टर को बुरी तरह कमजोर कर दिया है। जिस काम से कारीगरों को साल भर रोजगार मिलता था अब वह मात्र 4-5 महीने का रह गया है।
क्षेत्रीय अर्थशास्त्र विभाग के शिक्षक व शोधार्थी डॉ. अजीत सिंह ने बताया कि इस उद्योग के बहुत ज्यादा अव्यवस्थित होने की वजह से कारीगरों को स्टैंडर्ड मजदूरी नहीं मिल रही और यह सीधा डिमांड के हिसाब से बदलती रहती है। अध्ययन में सच्चाई सामने आई, जिसमें पता चला कि कारीगर की एक दिन की कमाई 150-250 रुपये हैं, वर्ष 2024 से काम करने वाले फातिमा समेत कई कारीगरों को तीन दिन की मेहनत के 80 रुपये जितनी कम कमाई भी मिली है। वर्ष 2018 से काम कर रहीं शैफाली ने बताया कि जब डिमांड ज्यादा होती है तो उन्हें हर दिन 300-500 मिलते हैं, लेकिन जब डिमांड कम हो जाती है तो उनकी इनकम घटकर 200 रुपये हर दिन रह जाती है। वहीं, फ्रीलांसरों को भी कभी-कभी काम मिलता है, इसलिए उन्हें दूसरी नौकरियां करनी पड़ती हैं।
कम इनकम से कारीगरों और उनके परिवारों की बेसिक जरूरतें पूरी नहीं होती। इस आर्थिक अस्थिरता ने कई लोगों को रोजगार के दूसरे तरीके ढूंढने पर मजबूर किया। कच्चे माल की ज्यादा कीमत सिल्क, धातु के धागे, सेक्विन और मोती जैसे कच्चे माल की लगातार बढ़ती कीमत के कारण जरी कारोबारियों को अपना मुनाफा का मार्जिन बनाए रखना मुश्किल है। कच्चे माल का एक बड़ा हिस्सा चीन से इंपोर्ट किया जाता है, जिससे उद्योग को इंटरनेशनल कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लागू होने से यह समस्या और भी बदतर हो गई है।
1700 यूनिट के अलग-अलग हिस्सों पर हुआ अध्ययन-
इस अध्ययन के लिए जिले में जरी जरदोजी की 1700 यूनिट के अलग-अलग हिस्सों पर अध्ययन हुआ है। जोगी नवादा में 200, कांकरटोला पुराना शहर में 500 यूनिट, चक-नवादा में 500 व रबड़ी टोला में 500 यूनिटों पर अध्ययन किया गया है। डॉ. अजीत ने बताया कि इस अध्ययन का प्रकाशन बीते दिनों स्कोपस इंडेक्सिंग जर्नल के जर्नल ऑफ विजुअल एंड परफॉर्मिंग आर्ट्स में प्रकाशित हो चुका है।