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प्रतिभा को सलामः खुद बढ़े अब दूसरों की प्रेरणा और मार्गदर्शक बन रहे रामदास

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बदायूं। मंजिल उन्हें मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता हौसले से उड़ान होती है। किसी शायर की कही यह पंक्तियां उझानी के मोहल्ला नारायणगंज निवासी रामदास यादव पर सटीक बैठती हैं। बतौर जिला व्यायाम शिक्षक आज रामदास यादव युवा पीढ़ी के भीतर खेल की अलख जगा रहे हैं। रामदास बताते हैं कि जब उन्होंने खेल के क्षेत्र को चुना था, तब उनके सामने तमाम दिक्कत आईं, क्योंकि उस समय खेल को हेय दृष्टि से देखा जाता था। एक बार जो वह इस क्षेत्र में आगे बढ़े तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने वर्ष 1992 में चंडीगढ़ में ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में खेलते हुए 400 मीटर बाधा दौड़ में दूसरा स्थान प्राप्त किया तो उसके बाद में दिल्ली में 1994 में हुई मैराथन दौड़ में वह तीसरे नंबर पर रहे।
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खेल के साथ-साथ रामदास पढ़ाई भी करते रहे। इसके बाद में उनका चयन बेसिक शिक्षा विभाग में जिला व्यायाम शिक्षक के रूप में हो गया। तब से वह वह युवा पीढ़ी को खेल में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, लेकिन खुद खेलने का मोह उनका अब भी कम नहीं हुआ है। यही वजह है कि उन्होंने वर्ष 2019 में बनारस में हुई दो दिवसीय मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में प्रतिभाग किया और गोल्ड मेडल झटक लिया। इसके चलते उनका सलेक्शन राष्ट्रीय मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में हो गया है, जो 11 फरवरी तक चंडीगढ़ के देवी लाल स्टेडियम पंचकुला में होगी।
खेलों के प्रति जज्बा चाहिए, मंजिल तो मिल ही जाएगी
व्यायाम शिक्षक रामदास कहते हैं कि भले ही वह शिक्षा विभाग में व्यायाम शिक्षक के रूप में अपनी सेवा दे रहे हों लेकिन इससे उनके खेल के प्रति जज्बे पर कोई फर्क नहीं पड़ा। खेल से अच्छा व्यायाम वह किसी को नहीं मानते। शरीर की फिटनेस के लिए युवाओं से भी खेलने की वकालत करते हुए रामदास कहते हैं कि खेल के प्रति जज्बा हो तो मंजिल कठिन नहीं होती। यही वजह है कि आज भी वह राष्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रतिभाग करने जा रहे हैं। कहते हैं कि खेल में भी कॅरियर बनाया जा सकता है, इसलिए इसे हेय दृष्टि से देखने वालों को अपनी सोच बदलनी चाहिए।
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