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थियेटर से बाहर आनी चाहिए महिलाओं की जंग

Wed, 08 Mar 2017 01:11 AM IST
बरेली।  
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Women's war should come out of the theater - फोटो : बरेली, अमर उजाला
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जब औरतों के अधिकार और बराबरी केहक की बात आती है तो अक्सर लोग इसे आदमियों को पछाड़ने की लड़ाई समझकर भड़क जाते हैं। क्यों इस लड़ाई को गलत मोड़ देकर सीमित करने की कोशिश हो रही है? विंडरमेयर थियेटर में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर बात करने को जुड़े रंगकर्मियों में से अवनीत कालरा ये सवाल उठाते हैं।
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 शुभा भट्ट भसीन बोलीं हैं कि हम एक ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहां उदारता हमारे थियेटर, कला, संगीत और साहित्य में ही दिखती है। एक इंसान के रूप में प्रेक्टिकली हम इसे अप्लाई नहीं कर पा रहे। कहती हैं कि कहीं न कहीं हमारे दिमाग में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता चला आ रहा कट्टरवाद खुलकर जीने नहीं दे रहा। यही हम औरतों की आजादी केसाथ भी हो रहा है।  हम थियेटर केजरिए इन सवालों को उठाने की कोशिश कर लेते हैं। हालांकि यहां आने केलिए बहुत मैनेज करना पड़ता है, लड़ना पड़ता है।
 पांच साल से थियेटर से जुुड़ीं माधुरी कश्यप पेशे से वकील हैं। कहती हैं लोग कहते है बदलाव हो रहा है, ये कैसे बदलाव है जब वकील, पत्रकार और पब्लिक डीलिंग एरिया में काम करने वाली लड़कियों को उनकेकरिअर केसाथ एक्सेप्ट नहीं किया जाता? उनकी शादी एक बड़ा चैलेंज बन जाती है?
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लुवीना खानचंदानी बताती हैं कि जब भी मैं किसी प्रोग्राम में हिस्सा ले रही होती हूं तो पापा अपने दोस्तों केसाथ देखने आते हैं पर शुरूआत में  थियेटर ज्वाइन करने के फैसले पर विरोध हुआ, देर शाम घर लौटना एक बड़ा इश्यू था। कहती हैं कि मैंने जिद नहीं छोड़ी तो समय केसाथ परिवार वाले समझने लगे हैं। समयुन खान बताती हैं कि गांव से सीधे जुड़ाव न होने के कारण दुनिया के बहुत रंगों से वाकिफ नहीं थीं।  पिछले दिनों मतदाता जागरूकता के लिए कई गांवों में जाकर नुक्कड़ नाटक किए। आम लड़की और औरतों की बहुत छोटी सी दुनिया होती है, पर रंगमंच उन्हें पूरी दुनिया से जोड़ देता है। लव तोमर बताते हैं कि इस्मत चुगतई के नाटक लिहाफ पर काम करते हुए एहसास हुआ कि 20वीं सदी में उन्होंने जिस बेबाकी से महिलाओं के मुद्दों को उठाया है, नए लेखक और दूसरे लोग अभी उतने भी प्रगतिशील नहीं हो पा रहे हैं।

एक दिन औरतों का
शुभा भट्ट भसीन कहती हैं कि हम औरतें पढ़ीं लिखीं है, लड़ झगड़कर ही सही अपने मर्जी से जी रही हैं। पर जो पढ़ी लिखी नहीं हैं, उन्हें दुनिया के बारे में कुछ पता ही नहीं। पिछले साल महिला दिवस पर घर में काम करने आने वाली दो महिलाओं को मैंने छुट्टी दी। बताया कि इस छुट्टी का रुपया नहीं काटा जाएगा। अगले दिन दोनों महिलाएं आईं तो उन्होंने पूछा कि आखिर छुट्टी क्यों दी गई थी।  बताती हैं कि मैंने उन्हें बताया कि कल तुम्हारा, मेरा और दुनिया की सभी औरतों का दिन था, तुम कुछ अपने मन का कर सको इसलिए आम दिनाें केझंझटोें से तुम्हें छुट्टी दी थी। शुभा बताती हैं कि दोनों को बहुत अचंभा हुआ कि भला ऐसा भी कोई दिन है.. तब एक बोलीं तो क्या आज सभी औरतों को हैपी बर्थ डे होता है?
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