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शहर काजी नहीं बन सकती महिला

Sun, 28 Feb 2016 02:12 AM IST
बरेली
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कानपुर के चमनगंज इलाके में एक महिला मारिया फजल को शहरकाजी घोषित कर दिए जाने पर उलमा ने सवाल खड़े दिए दिए है। खास तौर से दरगाह आला हजरत स्थित सुन्नी मरकज के उलमा ने एतराज जताते हुए इसे गैर शरई करार दिया है।
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दरगाह आला हजरत स्थित मदरसा मंजरे इस्लाम मौलाना डॉ. एजाज अंजुम ने कहा है कि महिला को शहर काजी का पद देना गलत है। उसको मोबल्लिगा (तबलीग करने वाली) तो बनाया जा सकता है मगर शहर काजी का ओहदा नहीं दिया जा सकता। वजह यह है कि शहर काजी के लिए बहुत से मामलात जुड़े होते हैं और शहर काजी को फैसला देना होता है। महिला का फैसला शरई उमूर (मामलात) में नाफिज (लागू) नहीं है क्योंकि महिला को नाकिमुल अक्ल (न समझ) माना जाता है और शरियत ने नाकिमुल अक्ल को फैसले का अधिकार नहीं दिया है।
उन्होंने कहा कि अगर कोई महिला तन्हा किसी शरई मामले में गवाही देगी तो उसकी गवाही काबिले कुबूल नहीं। जैसा कि चांद देखने का ही मसला ही लिया जाए कि अगर कोई महिला त्योहार के चांद की शहादत दे तो उसकी गवाही कुबूल नहीं होगी। जबकि उसने चांद अपनी नजर से देखा हो तो भी। दो महिलाओं की गवाही मिला कर एक गवाही मानी जाती है। ‘अल्लाह के रसूल ने फरमाया कि महिला में अक्ल और दीन की कमी है’। अब ऐसी सूरत में महिला को शहर काजी बनाया जाना शरियत में दखलअंदाजी होगी।
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हाकिम का पद है शहर काजी
बरेली सुन्नी मरकज के शहर काजी ने आल इंडिया जमात रजा-ए-मुस्तफा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती असजद रजा से बात की है। उन्होंने सुन्नी महिला काजी-ए-शहर को गैरशरई बताया है। उन्होंने कहा कि इस जमाने में शहर काजी का पद हाकिम के जैसा होता है और औरतों की शयान-ए-शान नहीं कि वह काजी बनें। काजी-ए-शहर तमाम मुल्की, मिल्ली, समाजिक मसलों पर शरीअत की रोशनी में फैसला करता है। जिसकी पूरी समझ एक महिला में नहीं मानी जाती।
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