बरेली। नगर निगम सदन में सोमवार को नगर आयुक्त निधि गुप्ता वत्स ने बजट बैठक के दौरान पार्षदों और मेयर की ओर से उठाए गए मसलों पर लिखकर देने के लिए कहा। इससे पहले एक जुलाई को विकास भवन में हुई जिला विकास समन्वय और निगरानी समिति (दिशा) की बैठक में सांसदों और विधायकों की शिकायतों पर जिलाधिकारी ने उनसे लिखकर देने की बात कही थी। इन बैठकों के बाद अब चर्चा ये होने लगी है कि क्या जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच ये आपसी खींचतान है? अथवा कोई एक पक्ष ऐसा है जो नियमानुसार नहीं चल रहा?
सवाल ये है कि सदन की बैठक में जनप्रतिनिधियों की ओर से उठाए गए मसलों के बाद क्या उन्हें लिखकर भी देना चाहिए? या फिर अधिकारी को स्वत: संज्ञान लेकर इस पर कार्रवाई करनी चाहिए? जानकारों का कहना है कि नगर निगम सदन या फिर दिशा जैसी बैठकें इसीलिए होती हैं ताकि जनप्रतिनिधि अधिकारी के सामने जनता की समस्या रख सकें और अधिकारी उन्हें दूर करने का प्रयास करें। ये बैठकें आपसी समन्वय के लिए भी होती हैं। बहस का यह मसला जनता के बीच उछला तो अमर उजाला ने इसमें दोनों पक्षों और विशेषज्ञों से इस पर बात की। आप पढि़ए कि किसका क्या तर्क है।
और ये रहा अफसरों का तर्क
पार्षदों ने निर्माण विभाग में गड़बड़ी की बात कही थी। यह बात संपूर्ण विभाग को लेकर थी। किसी विशेष व्यक्ति को लेकर नहीं। ऐसे में क्या पूरे विभाग की जांच कराई जाए? इसलिए मैंने कह दिया कि लिखकर दीजिए। यदि कोई विशेष सड़क, विशेष काम को लेकर शिकायत की जाती तो उसकी जांच के आदेश दे देती। - निधि गुप्ता वत्स, नगर आयुक्त
किसी भी जनप्रतिनिधि को लिखित नहीं देना पड़ता है। वह जो भी कहते हैं उसे नोट किया जाता है। उसी आधार पर आगे की कार्रवाई होती है। जितने भी जनप्रतिनिधियों ने समस्याएं उठाई हैं, उनके समाधान के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया गया है। हां, एक मामले में एक ब्लाॅक प्रमुख ने मनरेगा में रुपये मांगने संबंधी शिकायत की थी। इस वजह से उनसे कहा गया था कि पीड़ित पक्ष सामने आए और शिकायत करे तो कार्रवाई करेंगे। -शिवाकांत द्विवेदी, डीएम
जनप्रतिनिधियों की बात
जनता जनप्रतिनिधि को अपने अधिकारों की रक्षा और सवालों के जवाब मांगने के लिए चुनती है। मैंने बैठक में जनहित के मुद्दों को उठाया। जनता की समस्याओं को सार्वजनकि रूप से रखा। बाकी जनप्रतिनिधि भी रख रहे थे। ऐसे में सबकुछ नोट किया जाना चाहिए और कार्रवाई करनी चाहिए। मैं इस प्रकरण को मुख्यमंत्री के समक्ष रखूंगा। प्रशासनिक रवैये के प्रति अवगत कराऊंगा। -धर्मेंद्र कश्यप, सांसद आंवला
सदन की बैठक में जनप्रतिनिधि ने कोई बात कही है तो उस पर कार्रवाई होगी ही। अब मेरा व्यक्तिगत मानना यह है कि यदि मैं कोई शिकायत कर रहा हूं तो उसमें आधार जरूर होगा। इसलिए शिकायत हमेशा लिखित करनी चाहिए। लिखित शिकायत करेंगे तो जवाबदेही तय होगी।
- संतोष गंगवार, सांस
लिखकर देने का सवाल ही पैदा नहीं होता। बैठक किस बात की। निर्माण विभाग की गड़बड़ी पर जब लिखित में शिकायत करने के लिए कहा गया तो मैंने सदन की कार्यवाही में उसे दर्ज करा दिया है। साफ कह दिया है कि इसमें सुधार नहीं हुआ तो अगली बैठक में इसे सदन की अवमानना मानते हुए शासन को कार्रवाई के लिए संदर्भित कर दिया जाएगा। -उमेश गौतम, मेयर
कानून विशेषज्ञ की राय
संविधान के अनुसार, जनप्रतिनिधि जनसमस्याओं पर निर्देश देगा। जो भी उसके अधीनस्थ होगा, उसे बताएगा कि यह जन समस्या है और इसका निस्तारण होना है। यह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि जनप्रतिनिधि अफसरों को शिकायत लिखकर दें। वह बताएगा और अफसर उसे नोट कराकर उसके निस्तारण की दिशा में काम करेंगे। यदि जनप्रतिनिधि की बताई समस्या पर अफसर उसका फालोअप नहीं करते हैं तो उसका कारण भी उन्हें बताना होगा? अफसर यदि जनप्रतिनिधि की नहीं सुन रहे हैं तो इसका मतलब है वह लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म कर रहे हैं।
अनिल द्विवेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता