बरेली। गढ़वाल के गर्म पानी के कुंडों पर मौसम का प्रभाव पड़ रहा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में रुद्रप्रयाग के गौरीकुंड और चमोली के सोलधार कुंडों में सायनोबैक्टीरिया (ब्लू ग्रीन एल्गाई) समूहों पर यह असर देखा गया है। यह अध्ययन रुविवि के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार पांडेय व हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय कुमार ने मिलकर किया है।
डॉ. ललित ने बताया कि एसोसिएट प्रोफेसर धनंजय कुमार की उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में 6000 फुट ऊंचाई पर सैंपल जुटाने में मुख्य भूमिका रही। शोधार्थी सना इकरम ने भी इस अध्ययन में सहयोग किया। अध्ययन के अनुसार, मौसम में बदलाव से इन कुंडों में मौजूद सूक्ष्म जीवों की संरचना बदल रही है।
यह बदलाव कम तापमान (40 या 45 डिग्री सेल्सियस) वाले हिस्सों पर अधिक है। उच्च तापमान (50 या 55 डिग्री सेल्सियस) वाले स्थानों पर इसका असर कम देखा गया। गौरीकुंड में 40 और 45 डिग्री सेल्सियस पर अप्रैल से जुलाई तक सायनोबैक्टीरिया की प्रजातियों की विविधता बढ़ी। नवंबर में इसमें गिरावट आई। वहीं, 50 डिग्री सेल्सियस वाले स्थान पर प्रजातियों पर मौसम का कोई असर नहीं दिखा।
सोलधार कुंड में 40 डिग्री सेल्सियस वाले हिस्से में अप्रैल से नवंबर तक प्रजातियों की संख्या लगातार बढ़ी। जबकि 45, 50 और 55 डिग्री सेल्सियस वाले हिस्सों में यह स्थिति पूरे साल स्थिर रही। शोधकर्ताओं ने विभिन्न वैज्ञानिक सूचकांकों और विश्लेषणों से इन मौसमी बदलावों की पुष्टि की है।
अलग-अलग सूचकांक पर किया परीक्षण
शोधकर्ताओं ने शैनन और मार्गलेफ विविधता सूचकांक (किसी परिस्थिकी तंत्र में प्रजाति को मापता है) का उपयोग किया। बीटा और गामा विविधता विश्लेषण से समुदाय भिन्नता की पुष्टि हुई। कैनोनिकल कॉरेस्पोंडेंस एनालिसिस (सीसीए) ने दिखाया कि तापीय अंतर और जल के रासायनिक-भौतिक गुण सायनोबैक्टीरिया की मौजूदगी को नियंत्रित करते हैं। गौरीकुंड में यह नियंत्रण 91.34 फीसदी और सोलधार में 98.01 फीसदी तक है। एनोसिन और सिम्पर जैसी सांख्यिकीय विधियों ने भी मौसम आधारित बदलावों पर मुहर लगाई।
जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में सहायक
हिमालयी ग्लेशियरों पर सूक्ष्म शैवाल को लेकर एक नया शोध शुरू किया गया है। इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि के प्रभावों को समझना है। डॉ. ललित के अनुसार, यह अध्ययन सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित नहीं है। हालांकि, वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके निष्कर्ष भविष्य की बड़ी तस्वीर दिखाते हैं। यह शोध चरम स्थितियों से प्राप्त सूक्ष्म शैवाल के जैव-अन्वेषण पर केंद्रित है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि वैश्विक तापमान वृद्धि का क्या असर होगा। हिमालयी क्षेत्रों के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्रों में सूक्ष्म जीव कैसे प्रतिक्रिया देंगे, यह जानना महत्वपूर्ण है। इसका एक उद्देश्य त्वचा के लिए यूवी-सनस्क्रीन तैयार करना और तापमान-संवेदनशील एंजाइमों को अलग करना भी है।