हिंदी दिवस पर फिर से एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग की कमी खल रही है लेकिन इसकी शुरुआत कराने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन के स्तर पर कभी मजबूती पैरवी नहीं की गई। कुलपति प्रो. मुशाहिद हुसैन ने कई बार कहा कि जल्द विभाग शुरू हो जाएगा पर स्थिति सबके सामने है। इसके लिए उन्होंने यूजीसी को प्रस्ताव भेजने की बात कही थी लेकिन उसकी मंजूरी के लिए कोई पैरवी नहीं की। नतीजतन, हिंदी पट्टी के इस विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग नहीं है।
बरेली में पंडित राधेश्याम कथावाचक, बाल साहित्यकार निरंकार देव सेवक जैसे कई स्वनामधन्य हिंदी के रचनाकर जन्मे हैं लेकिन स्थापना के 40 साल बाद भी रुहेलखंड विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग न होना दूसरे विश्वविद्यालय वालों को चौंकाता है। शिक्षकों और छात्रों के बीच से इसकी मांग अर्से से की जा रही है लेकिन हुआ कुछ नहीं। विश्वविद्यालय प्रशासन हर बार सिर्फ यूजीसी को पत्र लिखकर औपचारिकता पूरी करता आया है लेकिन इसके लिए शासन और यूजीसी में पैरवी करने की जरूरत नहीं समझी गई। दो साल पहले विश्वविद्यालय ने यूजीसी को प्रस्ताव भेजा था, इसके बाद ही कुलपति ने मान लिया कि हिंदी के साथ उर्दू विभाग भी खुल जाएगा लेकिन अब वह इस पर सिर्फ उम्मीद तक ही सीमित हैं।
क्या है पेंच
जानकारों का मानना है कि अगर विश्वविद्यालय प्रशासन चाहे तो शिक्षा परिषद और कार्य परिषद में प्रस्ताव अनुमोदित कराकर हिंदी विभाग खोल सकता है क्योंकि सेल्फ फाइनेंस में कोई भी विभाग यूजीसी की गाइडलाइन के मुताबिक खोलने की अनुमति विश्वविद्यालय को है लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन सेल्फ फाइनेंस में यह विभाग नहीं खोलना चाहता। वह इसको यूजीसी की ग्रांट हासिल करके संचालित करना चाहता है जो आसान नहीं है। इसके लिए यूजीसी को विश्वविद्यालय का निरीक्षण करके सारे संसाधन देखने होंगे लेकिन इसके लिए कोई मजबूत पैरवी हो जाए तभी यह संभव है। सच यह भी है कि हिंदी विभाग के लिए यहां के जनप्रतिनिधि भी गंभीर नहीं हैं। नौ जिलों तक फैले विश्वविद्यालय कार्यक्षेत्र में कई केंद्रीय मंत्री और सांसद तथा विधायक होने के बाद भी हिंदी की उपेक्षा बरकरार है। केंद्र सरकार की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. श्वेतकेतु शर्मा कहते हैं कि रुहेलखंड विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग खुलने से शोध के नए रास्ते खुलेंगे इसलिए इसके लिए सबको मिलकर प्रयास करने होंगे।