URS's market hit by the closure of the Bejar
- फोटो : बरेली, अमर उजाला
उर्स-ए-आला हजरत पर हर साल लगने वाला इस्लामियां इंटर कालेज के बाजार पर इस बार नोट बंदी की मार है। बाहर से आने वाले जायरीनों की संख्या भी कम है। नगदी की कमी से जूझने वाले ग्राहक हर साल के सापेक्ष दुकानों पर काफी कम खरीदारी कर रहे हैं। बाहर से आने वाले दुकानदार अपनी दुकान सजाकर ग्राहक के आने का इंतजार करते हैं। ग्राहक या तो सामान की कीमत पूछकर आगे बढ़ जाता है। अगर कोई सामान तय भी हो गया तो दो हजार के नोट के बदले चिल्लर नोट देना मुश्किल होता है।
उर्स-ए-आला हजरत के मौके पर हर साल इस्लामियां इंटर कालेज परिसर और दरगाह के आस-पास तीन या चार दिन के लिए अलग मार्केट लगता है। इसमें दिल्ली, रामपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़, राजस्थान, कश्मीर के दुकानदार आकर अपनी दुकानें लगाते हैं। इस बार भी उर्स के बाजार में बच्चों और बड़ों के ऊनी कपड़े, कश्मीरी टोपी, जबरकट, बरेली का मशहूर सुर्मा, ताले, रेडीमेट कपड़े, किताबें, चादर आदि की दुकानें सजी हैं लेकिन खरीदार नदारद हैं। दुकानदारों का खाना, खर्च, कर्मचारियों की तनख्वाह निकलना मुश्किल हो रहा है। पांच सौ और एक हजार के नोट बंद होना इसकी मुख्य वजह है। ये पूरा बाजार नगदी पर चलता है। डेबिट या क्रेडिट कार्ड न चलने की वजह से मार्केट में सूनापन है। उर्स के पांडाल में बाहर से आए जायरीनों की संख्या भी काफी कम है। हालांकि दुकानदार बाकी बचे दो दिनों में कारोबार बेहतरी की उम्मीद लगाए हैं।