यूपी की पीलीभीत और बदायूं सीट पर बाहरी नेता और बाकी सीटों पर स्थानीय पसंद हैं। पीलीभीत और बदायूं में गांधी और मुलायम परिवार को आश्रय मिला है। बाहरी नेताओं ने कर्मभूमि बनाई। बरेली, आंवला, खीरी, शाहजहांपुर और धौरहरा लोकसभा सीटों में स्थानीय को तवज्जो मिलती है।
सियासत में अहम भूमिका निभा रहीं रुहेलखंड की दो लोकसभा सीटें पीलीभीत और बदायूं देश के बड़े नेताओं और राजनीतिक घरानों का आश्रय स्थल भी हैं। स्थानीय मतदाताओं की पसंद की वजह से आजादी के बाद से ही ये सीटें बाहरी नेताओं की कर्मभूमि बनी हुई हैं।
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वर्तमान में दोनों सीटों के सांसद वहां के स्थानीय निवासी नहीं हैं। इन सीटों पर समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर बाहरी प्रत्याशियों को मैदान में उतारने की शुरुआत कर दी है। सपा ने इटावा के मूल निवासी पूर्व मंत्री शिवपाल सिंह यादव को बदायूं और बरेली निवासी भगवत सरन गंगवार को पीलीभीत से मैदान में उतारा है।
इससे पहले भी बदायूं और पीलीभीत सीट से जनता दल के दिग्गज नेता शरद यादव, गांधी परिवार की मेनका गांधी और वरुण गांधी, मुलायम सिंह यादव के परिवार से धर्मेंद्र यादव, प्रयागराज के रहने वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री सलीम इकबाल शेरवानी सहित कई नेताओं ने संसद का सफर तय किया है। सबसे अहम बात यह है कि बाहरी प्रत्याशी सांसद बनने के बाद यहां टिके भी रहे।
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बात बदायूं की करें तो सबसे पहले यहां प्रयागराज से आकर वर्ष 1984 में सलीम इकबाल शेरवानी कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। वर्ष 1989 में बिहार निवासी शरद यादव जनता दल से सांसद चुने गए। उन्होंने यहां दोबारा भी भाग्य आजमाया था, लेकिन उन्हें मूल रूप से गोंडा के निवासी स्वामी चिन्मयानंद ने शिकस्त दे दी थी।
इसके बाद फिर सलीम इकबाल शेरवानी ने वर्ष 1996 से वर्ष 2004 तक लगातार बदायूं से जीत दर्ज की। वर्ष 2009 व 2014 में मुलायम सिंह यादव के भतीजे धर्मेंद्र यादव सांसद बने। हालांकि वर्ष 2019 में धर्मेंद्र यादव के खिलाफ प्रयागराज निवासी भाजपा की संघमित्रा मौर्या ने अपने नाम जीत दर्ज की।
आजादी के बाद स्थानीय को मिले कम ही मौके
आजाद भारत में पीलीभीत और नैनीताल लोकसभा सीट एक होती थी। पीलीभीत से कांग्रेस के मुकुंद लाल अग्रवाल ने पहली जीत 1951 में दर्ज की थी। अगले चुनाव में सीट बरेली के मोहन स्वरूप के हाथ गई। मोहन 1971 तक पीलीभीत से सांसद रहे। वर्ष 1977 में यहां से पूरनपुर के शेरपुर कलां के नवाब शमशुल हसन खां जीते।
इसके बाद वर्ष 1980 में बरेली के हरीश और वर्ष 1984 में भानुप्रताप सिंह सांसद बने। वर्ष 1989 में मेनका गांधी सांसद बनीं। इन्हें अगले चुनाव में पीलीभीत के निवासी भाजपा के परशुराम गंगवार ने शिकस्त दी, लेकिन वर्ष 1996 से लगातार 2004 तक और वर्ष 2014 में मेनका गांधी ही यहां से सांसद चुनी गईं। वर्ष 2009 और 2019 से अब तक उनके पुत्र वरुण फिरोज गांधी पीलीभीत का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।
बरेली से खीरी तक स्थानीय को मिली तरजीह
मंडल की बरेली, आंवला और शाहजहांपुर लोकसभा सीट के मतदाताओं ने स्थानीय प्रत्याशियों को ही हमेशा तरजीह दी। हालांकि आंवला लोकसभा सीट को वर्ष 2009 में मेनका गांधी फतह कर चुकी हैं, लेकिन इसके बाद स्थानीय निवासी धर्मेंद्र कश्यप लगातार दो बार से जीत दर्ज कर रहे हैं।
बरेली लोकसभा सीट पर वर्ष 2009 को छोड़कर वर्ष 1989 से 2019 तक संतोष गंगवार ने जीत दर्ज की। वर्ष 2009 में कांग्रेस से प्रवीण सिंह ऐरन ने जीत दर्ज की थी। दोनों ही लोग मूल रूप से बरेली के निवासी हैं। इसी तरह शाहजहांपुर, बरेली मंडल से सटी लखीमपुर खीरी और धौरहरा लोकसभा सीट पर स्थानीय नेता ही मतदाताओं की पसंद रहे हैं।