पीएम मोदी कहते हैं डिजिटल इंडिया, लेकिन यूनिवर्सिटी शाइनिंग बिल्डिंग पर ज्यादा जोर देती है। दरो-दीवार रंग रोगन से चमक रहे हैं, लेकिन दुनिया भर में नजर आने वाली वेबसाइट का कबाड़ा हुआ पड़ा है। जो प्रोफेसर दस साल पहले नौकरी छोड़कर जा चुके हैं। वेबसाइट उनसे अभी भी पढ़वा रही है। अहम बात यह है कि छुट्टियों की सूची पूरी तरह से अपडेट है। इससे समझा जा सकता है कि विश्वविद्यालय का ज्यादा इंट्रेस्ट किसमें है।
रुहेलखंड यूनिवर्सिटी में इनफार्मेशन टेक्नालॉजी का पूरा डिपार्टमेंट है। इसके बावजूद वेबसाइट के कुछ हिस्से दस-दस साल से अपडेट नहीं किए गए हैं। कई शिक्षक दो-दो प्रमोशन पा चुके हैं। कई प्रोफेसर रिटायर हो चुके हैं। कई छोड़कर जा चुके हैं। वेबसाइट है कि अभी भी दस साल पीछे चल रही है। विश्वविद्यालय में दाखिला लेने आने वाले छात्र या उनके अभिभावक वेबसाइट देखकर जब कैंपस पहुंचते हैं तो उन पर इस घपले का क्या इंपैक्ट होता होगा समझा जा सकता है। यूनिवर्सिटी के वेबसाइट है, डब्लूडब्लूडब्लूडॉटएमजेपीआरयूडॉटएसीडॉटइन। लिस्ट ऑफ इंप्लाई में असिस्टेंट प्रो.के कॉलम में सुरजन दास बंसल का नाम है। यह 2012 में रिटायर हो चुके हैं। विश्वविद्यालय की साइट इन्हें अभी भी लेक्चरर बता रही है। होटल मैनेजमेंट के पवन कुमार गुप्ता लगभग दस साल पहले यूनिवर्सिटी छोड़कर जा चुके हैं। वेबसाइट बताती है कि वह पढ़ा रहे हैं। इलेक्ट्रिकल इंजीनियिरंग के ऋषिपाल सिंह तकरीबन पांच साल पहले हाइडिल में चले गए। सूची में उनका भी नाम है। करीब छह साल पहले बीटेक के शिक्षक रुचिर गुप्ता छोड़ चुके हैं। उनका नाम भी नहीं हटा है। दिलचस्प यह भी है कि कई शिक्षक दो बार प्रमोशन पाकर प्रोफेसर हो गए हैं। साइट अभी भी उन्हें लेक्चरर बता रही है। इनमें प्रो. राजकमल, डॉ. संजय मिश्रा, प्रो. संजय गर्ग, प्रो. विजय बहादुर सिंह जैसे की नाम शामिल हैं। वार्डन की सूची में भी ऐसे ही घपले हैं। यूनिवर्सिटी के मीडिया प्रभारी प्रो. यशपाल सिंह ने कहा कि आपके माध्यम से यह बात संज्ञान में आई है। इसमें शीघ्र ही सुधार किया जाएगा।