चहारदीवारी में ही दम तोड़ गईं विरोध में उठने वाली आवाजेंशुरू में अशरफ को जेल में मिल रही इन सहूलियतों पर अंदरखाने विरोध की स्थिति भी रही पर अधिकारियों के झुकाव की वजह से निचला स्टाफ मन मसोस कर रह गया। बाद में अशरफ के गुर्गों ने भी अपने स्तर से स्टाफ से लेकर उपदव्री बंदियों तक को सेट कर लिया।
जेल के प्रमुख जिम्मेदारों को हर महीने नजराना पहुंचने लगा। बंदियों के लिए भी समय-सय पर दावत का इंतजाम किया गया। जेल के अंदर ही नवरात्र में फलाहार तो रमजान में इफ्तार का भी प्रबंध अशरफ की ओर से कराया जाता था। नन्हे उर्फ दयाराम के ऑटो में जेल के अन्य सामान के साथ दावत का सामान भी मंगाया जाता था।
अशरफ की सेवा में लगे थे आरक्षीजेल के अफसरों ने नियमों को ताक पर रखकर आरक्षियों को अशरफ की सेवा में लगा रखा था। अधिकारियों का हुक्म बजाने के अलावा उनके पास कोई रास्ता भी नहीं था। जेल में रहकर अशरफ जिससे चाहता, बात कर लेता था और जिससे चाहता मुलाकात करता था। उमेश पाल हत्याकांड में अशरफ का नाम आने के बाद से परतें खुल रही हैं। एक अधिकारी ने जब जेल अधीक्षक से सवाल किया था कि वह अशरफ को ये सुविधाएं डर की वजह से दे रहे थे या लालच की वजह से तो वह जवाब देने के बजाय बात घुमा गए।
अब तक आठ निलंबित
वरिष्ठ जेल अधीक्षक राजीव शुक्ला, जेलर राजीव मिश्रा, डिप्टी जेलर दुर्गेश प्रताप सिंह, जेल वार्डर शिवहरि अवस्थी, मनोज गौड़, बृजवीर सिंह, दानिश मेहंदी और दलपत सिंह।
सात जा चुके जेल
जेल वार्डर शिवहरि अवस्थी, मनोज गौड़, लल्ला गद्दी, आरिफ, नन्हे उर्फ दयाराम, फरहद उर्फ गुड्डू और सरफुद्दीन।
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