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दो हजार गज कम हो गया अक्षर विहार तालाब

Sat, 09 Apr 2016 01:24 AM IST
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
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तीन दशक पूर्व अक्षर विहार तालाब आठ हजार गज एरिया में था। तब यहां मछलियां पाली जाती थीं। दो दशक पहले तालाब की सफाई कराकर सुंदरीकरण कराया गया। रेलिंग लगी, रेस्टोरेंट खोले गए। लोग यहां बच्चों के साथ शामें गुजारने आने लगे।  20 साल पहले एक भाजपा के तत्कालीन सांसद राजबीर सिंह ने  तालाब के नजदीक नजूल की जमीन  फ्री होल्ड कराकर ले ली और फिर अनेजा ग्रुप को बेच दी। अब तालाब से लगा एक हिस्सा अनेजा के पास है तो दूसरा छावड़ा के पास । तब से अब तक तालाब का एरिया दो हजार गज कम हो चुका है।   
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तीन दशक पहले अक्षर विहार तालाब का एरिया आठ हजार वर्ग गज था। तत्कालीन नगरपालिका (अब नगर निगम) से इस तालाब में मछली पालन के ठेके दिए जाते थे। कैंट एरिया के विकसित होते ही तालाब के सुंदरीकरण की योजना बनी। तालाब की सफाई कराने के बाद लोहे की रेलिंग लगवाई गई।  12 साल पहले बोटिंग करते समय एक बच्चे की मौत हो गई तो नाव चलाने पर पाबंदी लगा दी गई।  रेलिंग और लाइटें लोग उखाड़ गए।  बिल्डर ने तालाब पाटकर पांच करोड़ से ज्यादा की जमीन कब्जा कर ली। नगर निगम के इंजीनियरों और कर्मचारियों के संरक्षण में शहर का बेहद महत्वपूर्ण तालाब पाटने का खेल अब भी जारी है।   

 मामला राजस्व परिषद पहुंचा 
जागर जनकल्याण समिति के सचिव डा. प्रदीप जागर ने अमर उजाला में समाचार प्रकाशित होते ही अक्षर विहार पाटकर उसकी बेशकीमती जमीन पर बिल्डरों के अनाधिकृत तरीके से कब्जा करने के मामले की शिकायत राजस्व परिषद में भेजी है। डा. प्रदीप कुमार का कहना है कि तालाब पाटने पर सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह रोक लगा रखी है। फिर भी तालाब पाटकर उसकी जमीन पर कब्जा किया जा रहा है तो नगर निगम और तहसील प्रशासन की जिम्मेदारी है कि इसे रोके। डा. प्रदीप कुमार ने कहा कि अगर राजस्व परिषद और प्रशासन ने जल्द ही मामले में संज्ञान नहीं लिया तो वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करेंगे। 
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‘तालाब के निकट बिल्डिंग निर्माण की एनओसी कैसे जारी हो गई। तालाब पर कब्जा हटना चाहिए। इसके लिए उच्च स्तर पर रणनीति बने। मैं कार्रवाई करने को तैयार हूं।’ विकास सेन, अतिक्रमण प्रभारी नगर निगम  

‘मैं तालाब का निरीक्षण खुद करूंगा। इसके बाद तालाब की नाप कराकर जहां तक हमारी हद है, वहां मजबूत रेलिंग लगवाई जाएगी।’ डा. आईएस तोमर, मेयर  


सोशल मीडिया पर भी छिड़ी बहस
अक्षर विहार तालाब बचाने के लिए व्हाट्सएप और फेस बुक के अलावा अन्य सोशल साइट्स पर भी बहस छिड़ गई है। अमर उजाला में समाचार प्रकाशित होने के बाद ज्ञानदेव ने व्हाट्सएप पर टिप्पणी की कि सरकारी  लोग तालाबों का रेप कर रहे हैं। नौकरी सरकार की, वफा बिल्डरों से। महेश स्वरूप सक्सेना का कमेंट था कि कानून को अपने शिकंजे में कर लिया है इन्होंने मिलकर। अस्मिता श्री ने व्हाट्एप पर पोस्ट किया कि कंपनी बाग से लेकर अक्षर विहार तक ये बिल्डर्स ऐसे काम कर रहे हैं कि पर्यावरण के साथ रास्ते से निकलना दुश्वार हो गया है। मजे की बात ये है कि ये पूरी लोकलिटी गवर्नमेंट आफीसियल से भरी हुई है। महेंद्र मनुज ने टिप्पणी की कि कुंभकरण अब भी जाग जाए तो बात बन सकती है। सुरेश सुंदरानी का कमेंट था --फाइव करोर इज टू लेस इस्टीमेट। संजय सक्सेना और प्रदीप कुमार ने भी इससे सहमति जताई। मोहम्मद खालिद जिलानी का कमेंट था-सख्ती होनी चाहिए। बे-ईमान अफसर बिल्डर माफिया जेल की सलाखों के पीछे होने चाहिए। जिस स्थान पर अपार्टमेंट बना रहे हैं, वह भी विवादित और जांच में लंबित है। 


‘अक्षर विहार तालाब के निकट नजूल की जमीन हमने फ्री होल्ड कराकर अनेजा ग्रुप को बेच दी थी। हमें जमीन फ्री होल्ड कराने के बाद पता चला कि यहां मकान नहीं बना सकते। हालांकि अब तो मकान बन रहे हैं।’ 
-राजवीर सिंह, पूर्व सांसद आंवला
‘नटराज के बैक साइड में हमारी जमीन है। बाकी जमीन छाबड़ा की है। हमारी जमीन का अक्षर विहार तालाब से कोई मतलब नहीं है। हमने महापौर को तालाब की पैमाइश कराने के लिए खुद लिखकर दिया है। जिधर से तालाब पाटा जा रहा है, हमारा नहीं  है।’ 
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-अमरपाल सिंह रोंपी, अनेजा ग्रुप 
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