बरेली। दिल्ली, हरियाणा से आने वाले मजदूरों की बेबसी भरी कहानियां हैं। किसी को दो दिन से खाना नहीं मिला तो किसी का सामान मकान मालिक ने सड़क पर फेंक दिया। ऐसे में जिसे जो साधन मिला, वह उसी से घर की ओर चल दिया। भले ही सफर सैकड़ों किमी का हो और साधन के नाम पर महज साइकिल या ठेली हो। हौसले के दम पर ही दिल्ली से ठेली पर तीन मजदूर बिहार के बेगूसराय को निकले। बरेली बाईपास से गुजरते वक्त इन्होंने अमर उजाला से अपनी बेबसी बयां की।
बेगूसराय निवासी शंभू, पंकज और चंदन दिल्ली के सदर बाजार इलाके में चार हजार रुपये महीने के कमरे में किराये पर रहते थे। कोई ठेली चलाता था तो कोई फैक्टरी में काम करता था। कोरोना का दौर आया तो तीनों ही अपनी ठेली से घर जाने को निकल आए। बताया कि 22 तारीख से काम बंद होने के बाद वह कमरे में पड़े थे। राशन और पैसा खत्म हो गया। मकान मालिक ने किराया न मिलने पर उनका सामान सड़क पर फेंक दिया। महंगा सामान रोक लिया। करीब एक सप्ताह उन्होंने गली में तिरपाल डालकर इस आस में समय काटा कि शायद माहौल ठीक हो जाए। फिर गुरुवार रात में ठेली से ही चल दिए। बताया कि एक व्यक्ति ठेली चलाता है तो दो लोग उस पर बैठे रहते हैं। उसके थकने पर बाकी लोग चलाते हैं। कहा कि दिल्ली अब नहीं जाएंगे। वहां कोई किसी से मतलब नहीं रखता। गांव में अपनी खेती या दूसरे की मजदूरी कर लेंगे।
गोंडा के मजदूरों का दर्द भी छलका
दिल्ली के लक्ष्मी नगर में रहने वाले गोंडा के छह मजदूर भी बचते बचाते निकल आए। उन्हें लालकुआं तक पैदल आना पड़ा। वहां से बस मिल गई। बस ने बरेली में सेटेलाइट स्टैंड छोड़ने की बजाय विलयधाम पर ही छोड़ दिया और लौट गई। यहां से मजदूर पैदल ही इन्वर्टिस विवि स्थित जीरो प्वाइंट पहुंचे और बस का इंतजार करने लगे। इनमें से बुजुर्ग लालू ने प्रधानमंत्री के अचानक जनता कर्फ्यू व लॉकडाउन के फैसले पर ही सवाल उठा दिया। कहा कि इससे पहले दो या तीन दिन का वक्त देते तो लोग अपने घर पहुंच जाते। कैसी भी रूखी सूखी खा लेते। दिल्ली में पुलिस बहुत बेइज्जती कर रही है। गांव में पड़ोसी मदद करता है, दिल्ली में कोई भूख या ठंड से मर जाए किसी पड़ोसी को फर्क नहीं पड़ता।
पानीपत से दिल्ली तक पैदल आया परिवार
पानीपत की फैक्टरी में काम करने वाले विनोद और उनकी पत्नी बिट्टो अपने बच्चे के साथ शाहजहांपुर के डबरा गांव स्थित गांव जाने को निकले थे। बताया कि रात में पानीपत से सफर शुरू किया तो शनिवार शाम को दिल्ली पहुंचे। वहां से बस से बरेली तक आ सके हैं। अभी गांव करीब सौ किमी दूर है। प्रयास कर रहे हैं कि कोई वाहन मिल जाए, जिससे कम से कम शाहजहांपुर तक तो पहुंच ही जाएं। विनोद का कहना था कि प्राइवेट नौकरी में कितना कष्ट है, अब समझ पा रहे हैं। अब सोचा है कि गांव में खेती करेंगे या कोई दुकान खोल लेंगे।
सबको खाना खिलाया, वाहन न रोके तो डंडा दिखाया
विलयधाम से सटे कुम्हरा गांव में हाईवे किनारे तीन दिन से भंडारा चल रहा है। गांव के नेता निरंजन पटेल ग्रामीणों के सहयोग से कभी आलू पूड़ी तो कभी तहरी बंटवा रहे हैं। रविवार को भी यहां भंडारा लगा था। तहरी के साथ घी व अचार भी लोगों को उपलब्ध कराया जा रहा था। निरंजन यहां आने वाले हर परिवार को खाना खिलाने के बाद आगे भेजने की व्यवस्था कर रहे थे। इसके लिए इधर से गुजरने वाले ट्रकों, कैंटरों व मेटाडोर से लेकर छोटे वाहनों को भी रोका जा रहा था। कई बार जब वाहन नहीं रुके तो निरंजन व उनके साथियों ने सड़क घेरकर डंडे दिखाकर वाहन रुकवा लिए। इसके बाद अधिकतम लोगों को इनमें बैठाकर आगे रवाना करा दिया।
नगर पंचायत ने टैंकर लगाया
विलयधाम पर नगर पंचायत रिठौरा ने पानी का टैंकर लगाया है। इससे दिल्ली से आने वाले मजदूरों को पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। वहीं इज्जत नगर पुलिस की गाड़ी पुल के नीचे खड़ी होकर अनाउंस कर रही थी। यहां से छोटे वाहनों की व्यवस्था कर सेटेलाइट चौराहा जाने को कहा जा रहा था, जहां से आगे की बस मिल सके। कई लोगों को इन्वर्टिस जीरो प्वाइंट भेजा गया।