बरेली। अमावस्या पर पितरों को विदा किया जाता है। इसलिए इसे पितृ विसर्जन अमावस्या कहते हैं। इस बार अमावस्या तिथि गुरुवार को होने के कारण विशिष्ट मोक्षदायी योग बन रहे हैं। गुरुवार को भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। अमावस्या को उनका भी श्राद्ध किया जाता है जिन लोगों के मृत्यु की तिथि उनके परिजनों को पता नहीं होती है।
अमावस्या पितृपक्ष का अंतिम दिन है। सनातन धर्म में इसका विशेष महत्व है। मान्यता है कि हर वर्ष पितृपक्ष शुरू होने से लेकर अमावस्या तक सारे पितृ मृत्यु लोक में रहते हैं। यमराज भी पितरों की आत्मा को मुक्त कर देते हैं। अमावस्या को पितृ अपने लोक में चले जाते हैं। श्राद्ध श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। पितृ प्रसन्न होकर परिवार को खुशियों से भर देते हैं। जिससे परिवार में साल भर तक मांगलिक काम होते हैं। अमावस्या को श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। इसलिए लोगों को ब्रह्म मुहुर्त में उठकर नित्य कामों से निवृत होना चाहिए। बिना साबुन लगाए साफ कपड़े पहने। घर में भी सात्वकि भोजन बनाना चाहिए। इसके बाद जलदान करके तर्पण करना चाहिए। शाम को सरसों के तेल के पांच दीपक जलाएं। जिनमें चार दीपक घर की चौखट पर रखना चाहिए। पांचवा दीपक और लोटे में जल लेकर दक्षिण दिशा की मुंह करके प्रार्थना करें कि आज पितृपक्ष समाप्त हो रहा है। हमारे परिवार को आशीर्वाद देकर वर्ष भर खुशहाल और स्वस्थ्य रखें। इसके बाद मंदिर जाकर जल को पीपल के पेड़ पर चढ़ा दें और दीपक को पेड़ के नीचे रख दें।
पितृ विसर्जन अमावस्या का विशेष महत्व है। ऐसे में जिनकी तिथि याद नहीं होती है, उनका भी श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है। पंडित अनुपम कौशिक इंदीवर, ज्योतिषाचार्य