बरेली। मार्च के आखिर में जब 21 दिन के लिए लॉकडाउन लागू होते ही तमाम कारखानों पर ताला लगने के साथ रोजी-रोटी का सिलसिला भी थम गया। उम्मीद थी कि 21 दिन बाद फिर सब सामान्य हो जाएगा लेकिन अब यह उम्मीद दूर-दूर तक पूरी होती नजर नहीं आ रही। जेब में जो पैसा था, निपट चुका है। वक्त गुजरने के साथ चिंताएं बढ़ रही हैं। महीने भर में ही पता लग चुका है कि गांव में गुजारा नहीं होने वाला। लिहाजा शहर की ओर फिर टकटकी लग गई है। इंतजार बस इस बात का है कि किसी तरह शहर में कोरोना से जिंदगी बचने की गारंटी हो जाए, फिर वे उसी राह पर लौट जाए जिस पर उनकी जिंदगी चल रही थी।
बृहस्पतिवार की तेज तपिश भरी गर्मी के दौरान अमर उजाला की टीम जब खजुरिया ब्रह्नान और उमरिया गांव पहुंची तो वहां के रास्तों पर सन्नाटा पसरा हुआ था। गांव के दूसरे छोर पर पहुंचकर एक पेड़ के नीचे तमाम युवकों का जमावड़ा लगा मिला जिनमें ज्यादातर प्रवासी थे और लॉकडाउन में मुश्किल भरा लंबा सफर करके हरियाणा और हिमाचल के शहरों से लौटे थे। बातचीत शुरू हुई तो इन प्रवासियों ने उन दिक्कतों का लंबा ब्योरा बयान किया जो सैकड़ों किलोमीटर के पैदल सफर में उन्हें उठानी पड़ीं। बोले, जब लंबा सफर पैदल ही तय करके गांव पहुंचे तो मन इतना टूट चुका था कि हर पल यही सोचते थे कि अब कभी वापस नहीं जाएंगे। शहरों में पैसा कुछ ज्यादा भले है मगर अपनापन नहीं है लेकिन गांव आने के बाद कुछ दिन गुजारे तो पता चला कि यहां की जिंदगी भी इतनी आसान नहीं है। दो महीने से ज्यादा समय तक बेरोजगारी के हालात में काटने के बाद बचाखुचा पैसा भी खर्च हो गया है। लिहाजा अब कोई विकल्प ही नहीं है कि शहर लौटकर रोजी-रोटी के लिए अपनी जिंदगी को खतरे में डालें।
मोदी जी का भाषण और अपने यहां के नेताओं का हाल.. एकदम उलट है
गांव वालों ने बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही अपने भाषणों में बार-बार प्रवासियों को हुए कष्ट पर माफी मांगी हो और उनकी मदद के लिए भी कह रहे हैं लेकिन यहां उन्हीं की पार्टी के सांसद-विधायक में से कोई गांवों में प्रवासियों का हाल पूछने तक नहीं निकला। जब गांव में दो महीने गुजरने के बावजूद जनप्रतिनिधियों को उनके पास आने की फुर्सत नहीं मिली तो आगे भी वे उनसे कोई उम्मीद नहीं कर सकते। ग्राम प्रधान जो गांव का मुखिया होता है, वह भी उनके परिवार का हाल जानने नहीं पहुंचा। इसके बजाय रास्ते में कहीं आमना-सामना हो तो दूर से ही रास्ता बदल देते हैं ताकि कहीं वे अपनी तकलीफ उनके सामने बयान करने लगें।
प्रवासियों का कड़वा सवाल.. जेब में एक पैसा तो है नहीं, कैसे बनेंगे आत्मनिर्भर
गांव में लौटे प्रवासियों में कोई शहर में कारपेंटर और पेंटिंग का काम करता था तो कोई बतौर मैकेनिक या दवा की कंपनी में काम करता था। इन प्रवासियों का कहना है कि दो महीने से ज्यादा वक्त तक चले लॉकडाउन में ही उनकी ज्यादातर जमा पूंजी खर्च हो चुकी है। कोई छोटा कारोबार भी शुरू करने के लिए कम से कम एक लाख रुपये की रकम की जरूरत तो होगी ही। इतनी रकम किसी के पास नहीं है और न कोई उन्हें उधार देने को तैयार है। गांव में जो थोड़ी-बहुत जमीन है, अगर कारोबार शुरू करने के लिए उसे भी गिरवी रख दिया तो आत्मनिर्भर होने से पहले वह भी हाथ से निकल जाएगा। वैसे भी उन्हें लगता है कि सरकार आत्मनिर्भरता की बात उनके लिए नहीं बल्कि कारोबारी लोगों के लिए कह रही है।
प्रवासियों से संक्रमण फैलने का डर इसलिए अनलॉक में भी कोई नौकरी नहीं दे रहा
गांवों में लौटे प्रवासियों ने बताया कि उन्हें उम्मीद थी कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद उन्हें अपने ही जिले में कोई न कोई रोजगार मिल जाएगा। अनलॉक की शुरुआत के साथ शहर में दुकानें खुल गई हैं और फैक्ट्रियां भी चलने लगी हैं लेकिन संक्रमण के खतरे से डरे लोग प्रवासियों को काम देने को तैयार नहीं है। वे फैक्ट्रियों में पहले से काम करने वालों को ही बुला रहे हैं। कारपेंटर, पेंटर, जरी जरदोजी, मैकेनिक जैसे तमाम और काम करने वालों के लिए भी बरेली में कोई खास गुंजाइश नहीं दिख रही है। जो काम भी मिल रहा है, उसके लिए बमुश्किल आठ से दस हजार तक की ही पगार दिखाई जा रही है।
प्रधानी के चुनाव को संवार रही है मनरेगा प्रवासियों का किसी को ख्याल ही नहीं
प्रवासियों के साथ गांव के आम लोगों ने भी अमर उजाला को बताया कि मनरेगा से मिली मजदूरी से परिवार चलाना मुश्किल है। 202 रुपये की मजदूरी में एक ही व्यक्ति का खर्च निकल सकता है लेकिन उनकी चिंता पूरे परिवार को पालने की है। ग्राम प्रधान अपने चुनाव की तैयारी में जुटे हैं, शहरों से बेघर होकर लौटे लोगों के बजाय उन्हें अपने वोटों की फिक्र है। गांव में रह रहे लोगों ने बताया कि गांव में जिन लोगों के जॉब कार्ड बने हैं, उन्हें ही काम मिल नहीं रहा है लिहाजा बाहर से लौटे लोगों को काम मिलने की उम्मीद करना ही मुश्किल है। ज्यादातर ग्राम प्रधान सिर्फ अपना हित साधने में लगे हुए हैं। अफसरों को फुर्सत नहीं हैं और नेता गांव की राजनीति में दखल नहीं देना चाहते।
कंपनियां बुला रही हैं.. लेकिन कोरोना के काबू में आने से पहले नहीं जाएंगे
हिमाचल और हरियाणा समेत कई दूसरे राज्यों से लौटे प्रवासियों के मुताबिक अनलॉक शुरू होने हफ्ते भर बाद से ही उन कंपनियों से उन्हें बुलाने के लिए कॉल आने लगी हैं जहां वे काम करते थे। हालांकि शहरों में अब कोरोना का कहर और ज्यादा बढ़ गया है इसलिए वे फिलहाल वहां नहीं जाना चाहते। कंपनियों से उन्होंने कहा है कि कोरोना संक्रमण पर काबू होने के बाद ही वे लोग काम पर वापस लौटेंगे। इन प्रवासियों ने बताया कि नौकरी और मेहनत-मजदूरी से उन्हें रोजाना पांच सौ रुपये तक की कमाई हो जाती थी लेकिन बरेली जैसे जिले में कामगारों के सामने ऐसे कोई विकल्प नहीं है जो इसकी भरपाई कर सके।
गांव लौटकर जिंदगी के सवालों में घिरे प्रवासी
आज कोरोना खत्म हो जाए कल चले जाएं शहर
हरियाणा से करीब दो महीने पहले लौटे विनोद, भरत और आकाश ने बताया कि वह तीनों कारपेंटर हैं। हरियाणा से यही फैसला करके लौटे थे कि अब कभी वापस नहीं जाएंगे मगर यहां यह हालत है कि गांव के प्रधान ही मदद नहीं कर रहे। विवशता की स्थिति है, वे लोग मजदूरी तक करने को तैयार हैं लेकिन मनरेगा में भी कोई काम नहीं मिल रहा है। और किसी ने भी उन्हें काम देने की हामी नहीं भरी है। मायूस होने के बाद अब कोरोना का कहर थमने के इंतजार के सिवा कुछ नहीं बचा है। कोरोना खत्म होते ही फिर हरियाणा चले जाएंगे।
यहां गुजर-बसर मुश्किल, मौका मिलते ही लौटेंगे
हिमाचल प्रदेश से वापस आईं बिट्टो देवी और उनके बेटे हरगोविंद, बेटी गौरी और पति से बात की तो उन्होंने बताया कि वे लोग हिमाचल प्रदेश में एक दवा बनाने वाली कंपनी में काम करते थे। गांव के एक कार्यक्रम में शामिल होने पति पहले ही आ गए थे। कोरोना के दौर में बाकी लोग करीब महीने भर पहले ट्रेन से वापस लौटे हैं। यहां आठ लोगों का परिवार मनरेगा के भरोसे चल पाना मुश्किल लग रहा है। गांव में घर तो बना लिया है लेकिन खेती न होने से आय का और कोई जरिया नहीं है लिहाजा वापस ही लौटना पड़ेगा।
गांव-गांव प्रवासियों का यही हाल
चौबारी
यहां तो बेकार, इंतजार है कब दोबारा कंपनी शुरू होगी
चौबारी के अमित हिमाचल प्रदेश में एक जूते की फैक्टरी में काम कर रहे थे। होली पर 15 दिनों की छुट्टी लेकर घर आए थे, इसी दौरान लॉकडाउन हो गया। अमित के मुताबिक उन्होंने कंपनी में बात की तो बताया गया कि कंपनी बंद कर दी गई है और वहां कोई काम नहीं है। पिछले सप्ताह फिर संपर्क किया तो बताया गया कि दो महीने बाद आना। गांव में मनरेगा में पंजीकरण तो करा लिया है लेकिन कभीकभार ही काम मिलता है।
जुलाई में कंपनी चलेगी और अगस्त में हम चले जाएंगे
अरविंद भी हिमाचल प्रदेश की एक जूता फैक्ट्री में काम कर रहे थे जो लॉकडाउन में गांव चले आए। अरविंद ने बताया कि आने में तो कोई दिक्कत नहीं हुई। वह स्वस्थ भी हैं लेकिन यहां कोई काम नहीं मिला। मनरेगा से गुजारा नहीं हो सकता। कंपनी में बात की है जो अभी बंद है लेकिन इसी महीने के अंत तक वहां काम शुरू हो जाएगा और वह अगस्त में वापस चले जाएंगे। अरविंद ने उम्मीद जताई कि हो सकता है तब तक कोरोना का भयावह माहौल शायद कुछ शांत हो जाए।
चिनहटी
गांव में जरूरत लायक पैसा कहां, जाना ही पड़ेगा
चंदन राजस्थान में एक कंपनी में काम कर रहे थे। लॉकडाउन में कंपनी के बंद होने के एक सप्ताह बाद ही परिवार के साथ गांव आ गए और तबसे यहीं हैं। फिलहाल कुछ काम नहीं कर रहे हैं। चंदन ने बताया कि कंपनी में बात हुई है, वहां काम भी शुरू हो गया है और वह जाएंगे भी, लेकिन अभी कुछ दिन गांव में ही रुकेंगे। बोले, बाहर जाए बगैर गुजारा नहीं हो सकता। गांव में मजदूरी में इतना पैसा नहीं कि परिवार की जरूरतों को पूरा किया जा सके।
40 दिन से बेरोजगार हूं, लौटना ही पड़ेगा शहर
शंकर हिमाचल प्रदेश में एक कंपनी में ऑपरेटर थे। करीब 40 दिन हो गए हैं गांव वापस आए हुए लेकिन यहां अब तक कोई काम नहीं मिला। कहते हैं, शहर जाकर मजदूरी करो तो ढाई सौ और मनरेगा में करो तो दो सौ रुपये मिलते हैं। इतने में अकेले पेट की ही जरूरतें पूरी हो सकती हैं, परिवार नहीं चलाया जा सकता। फिलहाल रुके हुए हैं लेकिन काम शुरू होते ही वापस उसी कंपनी में चले जाएंगे जहां काम कर रहे थे।
राशन मिल गया पर मनरेगा से पूरी नहीं हुई उम्मीद
आजाद भी परिवार के साथ हिमाचल प्रदेश में थे। लॉकडाउन में घर लौटे लेकिन यहां कोई काम नहीं तलाश पाए। प्रवासी मजदूरों को जो राशन मिलना था वह ग्राम प्रधान की मदद से मिल गया लेकिन मजदूरी नहीं मिली है। मनरेगा में पंजीकरण कराया है, कुछ दिन काम करने गए लेकिन उसके बाद नहीं। यहां रह भी जाए तो मनरेगा में सिर्फ सौ दिन काम करने के बाद शहर के अड्डों पर जाकर रोजाना मजदूरी तलाश करनी पड़ेगी। शहर ही यहां से दस किलोमीटर है।
एक महीने और कंपनी बंद रहेगी फिर चले जाएंगे
सुशीला परिवार के साथ हिमाचल प्रदेश की एक एलईडी टीवी बनाने वाली कंपनी में थीं। वह वहां पैकिंग के काम में लगी हुई थीं। कहती हैं, लॉकडाउन के बाद सब गड़बड़ा गया। काम छूट गया, यहां गांव में रोटी का तो इंतजाम हो जाता है लेकिन इसके अलावा कुछ नहीं है। परिवार के लिए चार पैसे अलग से सिर्फ कहीं एक साथ काम करके ही जोड़े जा सकते हैं। एक से दो महीने बाद फिर वापस काम पर जाएंगी। अभी एक महीने तक तो कंपनी ने ही मना किया है।