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रंगों का भी होता है विज्ञान

Tue, 01 Mar 2016 01:35 AM IST
बरेली
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बरेली कॉलेज में ‘समकालीन कला में लोक कला की प्रासंगिकता’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन भी लोक कला पर विमर्श हुआ। कलाविदों ने लोक कला को कैसे आगे बढ़ाया जाए, इस पर भी चर्चा की। कहा गया कि लोक कला के अनेक रूप आधुनिक युग में नए कलेवर रंग सज्जा के साथ बाजार में बिक्री के लिए मिल जाते हैं। कई शोधार्थियों ने इस पर चिंता जताई। वक्ताओं ने कहा कि लोक कला अभिप्रायों के बाजारीकरण से लोक कला का वास्तविक स्वरूप कहीं विकृत न हो जाए।
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संगोष्ठी में डॉ. नवल कुमार गुप्ता ने कहा कि कला का ज्ञान बहुत गंभीर है। इसे कलाविदों से समझा जा सकता है।  कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भोपाल से आए प्रो. एलएन भावसार ने कहा कि लोक गीतों के माध्यम से गाकर मालवा के भित्ति चित्रों स्लाइड के माध्यम से दिखाई। कुरुक्षेत्र से आए दिलीप दास गुप्ता ने बताया कि रंगों का भी विज्ञान होता है, जो हमारे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
कार्यक्रम में भोपाल से आई डॉ. अर्पणा लॉड ने शोध पत्र पढ़ते हुए कहा कि आज युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित कर लोक कला को बचाया जा सकता है। संगोष्ठी में डॉ. साधना सिंह ने भी विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम के अंत में डॉ. मंजू सिंह ने आभार व्यक्त किया। इस मौके पर डॉ. अशोक सिंह, डॉ. एमके शर्मा, डॉ. वीपी सिंह, डॉ. आरएस पुंडीर, डॉ. चारु मेहरोत्रा, डॉ. रीना अग्रवाल, तजस्विता सिंह आदि मौजूद रहीं।
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