हाई प्रोफाइल होते जा रहे मेयर के चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा समेत सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में टिकट देते समय कैडर देखने के बजाय इस बात पर ज्यादा तवज्जो दी गई कि कौन प्रत्याशी कितना पैसे वाला है। दो दशक पुरानी राजनीति को देखें उस समय कांग्रेस का बोलबाला था, कहीं-कहीं जनसंघ (अब भाजपा) के उम्मीदवार कड़ी चुनौती पेश करते थे। कोई भी चुनाव हो, दोनों दलों में टिकट के मसले पर कैडर को ही प्राथमिकता मिलती थी। मगर अब चुनाव बेहद महंगा हो गया है, ऐसे में जब भी खर्च की बात आती है तो पैसे वाले प्रत्याशी कैडर वालों को पीछे धकेलने में कामयाब हो जाते हैं। जनसंघ और भाजपा से चुनाव लड़ने वाले पूर्व मेयर ही नहीं, उन्हें चुनाव लड़ाने वाले बुजुर्ग कार्यकर्ता भी पार्टी में धनबल की बढ़ती प्रवृत्ति से बेहद दुखी हैं। अमर उजाला से बातचीत में बुजुर्ग राजनीतिज्ञों ने इस संबंध में अपनी राय व्यक्त की।
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सब्जी-पूड़ी खिलाकर बन गए थे मेयर
- 1989 में शहर के प्रथम मेयर बने थे राजकुमार अग्रवाल
-- अपना खाना भी घर से खाकर आते थे कैडरबेस कार्यकर्ता
बरेली
संघ औैर भाजपा के कैडर से जुड़े रहे राजकुमार अग्रवाल अब स्वास्थ्य खराब होने की वजह से राजनीति में सक्रिय नहीं हैं। वह 1989 में शहर के पहले मेयर चुने गए थे। तब मेयर का चुनाव सीधे नहीं होता था बल्कि पार्षद मेयर चुनते थे। राजकुमार अग्रवाल कहते हैं कि तब नगर निगम चुनाव में भाजपा का कैडर कार्यकर्ता बिना किसी लोभ लालच के काम करने में लगा था। वे अपनी गाड़ी और डीजल से ही हमारा चुनाव प्रचार करते थे। बस, सुबह और शाम उनके खाने के लिए पूड़ी सब्जी बनवानी होती थी। हालांकि कुछ कैडर बेस कार्यकर्ता इतने स्वाभिमानी थे कि अपना खाना भी घर से लाते थे और चुनाव प्रचार में पूरे दिन तन मन धन से लगे रहते थे। अब तो टिकट से लेकर चुनाव प्रचार तक में कैडर पर पैसा हावी हो चुका है। तब कैडर से बढ़कर कुछ नहीं था। बहुत ज्यादा पैसा खर्च करके जो मेयर बनता है, वह पहले अपना खर्च निकालने की ही सोचता है। शहर के लिए कोई काम नहीं हो पाते।
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सिर्फ डेढ़ लाख में जीता था मेयर का चुनाव
- गाड़ी और डीजल तक नहीं मांगते थे कार्यकर्ता
- वर्ष 1995 में भाजपा से मेयर चुने गए थे सुभाष पटेल
बरेली।
पूर्व मेयर सुभाष पटेल बताते हैं कि वह 1991 में भोजीपुरा से विधानसभा का चुनाव लड़े तो कैडर कार्यकर्ताओं ने तन मन और धन से सहयोग किया। वह मात्र 1.5 लाख रुपये खर्च करके विधायक बन गए थे। 1995 में मेयर का चुनाव लड़ा तो उसमें भी बमुश्किल 1.5 लाख रुपया ही खर्च हुआ था। चुनाव प्रचार करने वाले कार्यकर्ता गाड़ी और डीजल तक नहीं मांगते थे। उस समय चुनाव मेें धन बल का इतना इस्तेमाल नहीं था। हर मामले में कैडर को पैसे से ऊपर रखा जाता था। अब तो कैडर कार्यकर्ता सिर्फ दरी बिछाते रह जाते हैं। चुनाव में पैसा और शराब तक बंटने लगी है। ऐसे मेें जो भी चुनाव जीतेगा, वह कितना काम कराएगा, यह समझा जा सकता है। जब वह मेयर बने तो नगर आयुक्त बाबा हरदेव सिंह थे। सब यही कहते सुने जाते थे कि नगर निगम में दो बाबा हैं- एक मैं--दूसरे हरदेव सिंह।
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तब कैडर के सामने पैसे की नहीं थी अहमियत
- संघ और भाजपा से जुड़े पुराने कार्यकर्ता तिलकराज छाबड़ा बोले
बरेली।
सन 1962 से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े एसबीआई के रिटायर्ड तिलकराज छाबड़ा 1997 में पूर्ण रूप से भाजपा से जुड़े। इससे पहले वह जनसंघ के विधानसभा, लोकसभा और महानगर पालिका अध्यक्ष के प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाते रहे। पुराने चुनावों का दौर की याद करते हुए वह बताते हैं कि उस समय चुनाव चाहे कोई भी हो, उसमें कैडर के सामने पैसे की कोई अहमियत नहीं थी। कार्यकर्ता भी जनसंघ से इस कदर जुड़ा था कि कांग्रेसी राज में भी वह अपने घर से खाना खाकर आता था। न किसी को डीजल की चाह थी, न गाड़ी की जरूरत। वोटरों को न पैसा या शराब बांटने का रिवाज था, न ही किसी अन्य तरह के प्रलोभन का। 50 हजार से एक लाख खर्च कर उम्मीदवार सांसद, विधायक और मेयर बन जाते थे। अब हालात बदल गए हैं। पैसा हर जगह हावी है। उसके सामने कैडर को पीछे होना पड़ता है।
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बादाम सिंह को चुनाव में दिए थे 100 रुपये
आपातकाल में जेल जा चुके हैं वीरेंद्र अटल
बरेली।
कैंट से 1962 में आछू बाबू और 1967 में रामाबल्लभ मिश्रा को जनसंघ से चुनाव लड़ाकर एमएलए बनाने में अहम भूमिका निभाने वाले भाजपा के पुराने कार्यकर्ता वीरेंद्र अटल आपातकाल में जेल भी गए थे। उनका कहना है कि रामाबल्लभ मिश्रा का चुनाव लड़ाने के लिए जब वह जनसंघ से जुड़े, तब वह विद्यार्थी थे। दिन-रात उनका प्रचार करते थे। खाना भी घर लौटकर खाते थे। 1974 में बादाम सिंह जनसंघ से प्रत्याशी बने तो वह चुनाव में सहयोग के लिए 100 रुपये लेकर उनके पास गए। बादाम सिंह ने उनको गले से लगा लिया। उनका कहना है कि तब कैडर बेस पार्टी होती थी। कार्यकर्ताओं के मन में पैसे लेकर चुनाव प्रचार करने का चलन नहीं था। त्याग समर्पण की भावना से चुनाव लड़ाए जाते थे। लोकसभा चुनाव में भी भाजपा प्रत्याशी को अपने घरेलू खर्च के लिए जमा किए छह हजार रुपये सहयोग के लिए दिए। कहीं मन में यह भाव नहीं रहा कि मुझे चुनाव जीतने के बाद उनसे कोई काम लेना है। अब तो पैसा कैडर पर भारी है।