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मन्नतों के चिराग हुए रोशन

Fri, 29 Jan 2016 01:04 AM IST
बरेली
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खानकाह नियाजिया में बृहस्पतिवार की शाम खास रही। शाम ढलते ही पूरा आंगन चिरागों की रोशनी से सितारों की तरह झिलमिला उठा। मानों आसमां से तारे जमीं पर उतर आए हों। जगह-जगह खड़े लोग महिला हो या पुरुष उनके हाथ दुआ में उठे थे और आंखों में नमी। जो इस बात की गवाही दे रही थी कि लोग अपना सारा दर्द और दुख बुजुर्गों के कदमों में डाल कर चिरागों की तरह अपनी जिंदगी को रोशन करा चाहते हों।
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 यही सच भी था। यहां इस शाम जश्न-ए-चिरागां की महफिल थी। इसमें भारी भीड़ के साथ जुटा हर शख्स अपने दिलों में मन्नतों की आस लेकर पहुंचा था। इस जश्न का आगाज सुबह कुरान ख्वानी से हुआ। इसके बाद देश विदेश से आए तमाम जायरीन दिन भर चादरपोशी और गुलपोशी करते रहे। शाम को महबूबे इलाही हजरत निजाम उद्दीन औलिया के कुल शरीफ की रस्म अदा की गई और मगरिब की नमाज के बाद बड़े पीर गौस पाक हजरत अब्दुल कादिर जीलानी के कुल शरीफ रस्म अदा की गई।
कुल के बाद जश्न-ए-चिरागां की रस्म का आगाज हुआ। सबसे पहले सज्जादानशीन शाह मोहम्मद हसनैन नियाजी उर्फ हसनी मियां ने सोने और चांदी के खानकाही चिराग रोशन किए। इसके बाद आमों खास के चिराग रोशन करने का सिलसिला शुरू हो गया। रात में कव्वाली की महफिल सजी और कुल के बाद साहिबे सज्जादा महबूबे इलाही के उर्स में शिरकत करने दिल्ली रवाना हो गए। यहां की सारे इंतजाम प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी की देख रेख में पूरे हुए।   
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जश्न-ए-चिरागां दे गया सद्भावना का पैगाम  
बरेली। खानकाह की तीन सदी पुरानी यह रस्म एक खास इबादत को अंजाम देती है तो देश की संस्कृति को भी मजबूत करती है। खास बात यह है कि यह रस्म पूरी इंसानी बिरादरी को जोड़ने का पवित्र मकसद भी रखती है। क्यों कि इस सूफियाना परंपरा में हर मजहबो मिल्लत के लोग बिना किसी झिझक के शिरकत करते नजर आए। इस तरह यह जश्न देश की गंगा जमुनी तहजीब के बल पर सद्भावना का संदेश भी देता नजर आया।  
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