बरेली। दोंद आलमपुर की गौंटिया गांव में जहरीले खाने से केहर सिंह की तीसरी बेटी धर्मेश्वरी (8) ने भी इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। धर्मेश्वरी का इलाज डीडी पुरम स्थित गंगाशील अस्पताल में चल रहा था। दो दिन में तीन बेटियों की मौत से केहर सिंह के परिवार पर आफत का पहाड़ टूट पड़ा है।
एक दिन पहले ही के हर सिंह राजपूत की दो बेटी हेमलता (7) और मधु (5) की मौत अचानक रात में उल्टी करने से हो गई थी। तीसरी बेटी धर्मेश्वरी को गंभीर हालत में डीडी पुरम स्थित अस्पताल में शनिवार को भर्ती कराया गया था, जहां रविवार दोपहर को उसने दम तोड़ा। केहर सिंह राजपूत के परिवार में दुख का माहौल है। गांव में भी लोग सहमे हुए हैं। परिवार के लोगाें के मुताबिक गुरुवार रात को सभी ने मछली खाई। सुबह फिर तीनाें बहनाें समेत अन्य ने बासी मछली का सेवन किया। डॉक्टर बता रहे हैं कि मछली खाना ही तीनाें बहनों के लिए काल बना है। जिसकी वजह से वह शरीर में जहर बन गई।
-- डॉक्टर भी समझ नहीं पाए कि आखिर बेटियों ने क्या खा लिया...
गंगाशील अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मुरलीधर छाबड़िया ने बताया कि परिवार के मुताबिक धर्मेश्वरी ने मछली खाई थी। हो सकता है कि वह मछली दूषित हो। इलाज के दौरान धर्मेश्वरी के पेट से 250 मिली काला खून वाला पानी निकाला गया है। जो अक्सर फूड प्वाइजनिंग के मामले में नहीं बल्कि किसी जहरीले पदार्थ की वजह से निकलता है। धर्मेश्वरी का बीपी भी 40 से 60 के बीच था। अधिक उल्टियां होने से उसकी सांस की नली में रूकावट आ गई जिससे उसे सांस लेने में दिक्कत हुई। उसके पेट से कोई खाद्य पदार्थ नहीं निकला है। डॉक्टरों को खाद्य पदार्थ को लेकर संशय है कि आखिर कैसे बच्चियाें को मछली इतनी नुकसान कर गई।
- दूषित और बासी मछली या फिर...
डॉ. एडी छाबड़िया ने बताया कि फ्रिज में तापमान मेनटेन रखने के लिए मांस मछली को उसमें रखते हैं। लेकिन इनके घर में बनी मछली को फ्रिज में भी नहीं रखा गया। यह मछली पहले से दूषित हो सकती है जो तालाब या फिर नजदीकी बाजार से खरीदी गई हो। ऐसे में बाहर रखी मछली छह घंटे में खराब हो सकती है। अगर परिवार में सभी ने यह मछली खाई है तो बीमार सभी होते लेकिन ऐसा नहीं रहा। मछली में कुछ खतरनाक पदार्थ भी हो सकता है।
- दो बहनों की मौत के बाद भी कोई नहीं पहुंचा गांव
घटना के दूसरे दिन न तो स्वास्थ्य विभाग और न ही तहसील का कोई अफसर पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचा। मामले की हकीकत जानने की भी स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन ने कोई जहमत नहीं उठाई।
अक्सर बंद रहती है हल्दी कलां न्यू पीएचसी
हल्दी कलां में न्यू पीएचसी बनकर तैयार है लेकिन किसी डॉक्टर की तैनाती नहीं है। यहां फार्मेसिस्ट ही दवा देते हैं। यह भी अक्सर अस्पताल से गायब रहते हैं। ऐसे में अस्पताल बंद ही रहता है। अगर गांव के किसी मरीज को प्राथमिक उपचार की जरूरत हो तो उसे मिलना बेहद मुश्किल है। लोगों मजबूरी में झोलाछाप डाक्टरों की शरण में जा रहे हैं।