बोलने, सुनने और देखने में अक्षम विशेष बच्चों को सामान्य बच्चों की तरह ही पढ़ाई का अधिकार है। मुख्यधारा के स्कूलों में सामान्य बच्चों के साथ पढ़कर वे ज्यादा तेजी से विकास कर सकते हैं। इसी मंशा से सरकार सर्व शिक्षा अभियान के तहत विशेष बच्चों की पढ़ाई के लिए हर साल लाखों रुपये का बजट दे रही है लेकिन इस आदर्श व्यवस्था को स्कूलों में लागू करने की न तो विभाग के पास सोच है न ही इच्छाशक्ति। इस व्यवस्था का विशेष अंग ‘एक्सिलरेटेड लर्निंग कैंप’ जीजीआईसी के भवन में आरंभ तो हो गया है, लेकिन यहां सिर्फ औपचारिकताएं ही निभाई जा रही हैं। अफसर भी इस कैंप के बहाने किसी तरह 15 लाख रुपये का बजट ठिकाने लगाने में लगे हैं।
कैंप का फोटो
मुख्यधारा की शिक्षा के लिए दरवाजे खोलता है यह कैंप
स्पेशल बच्चों की क्षमता बढ़ाकर उन्हें सामान्य स्कूलों में पढ़ने लायक बनाने के उद्देश्य से ‘सहशिक्षा आवासीय एक्सिलरेटेड लर्निंग कैंप’ 2009 से शुरू किए गए। हर सत्र में दस महीने के इस कैंप में 36 मूक बधिर और 24 दृष्टिबाधित बच्चों के लिए सीटें हैं। मूक बधिर दिव्यांगता की विशेष शिक्षिका शहनाज कहती हैं कि मूक-बधिर बच्चों में सीखने-समझने की क्षमता सामान्य बच्चों जैसी ही होती है, बस उन्हें सांकेतिक भाषा में हिंदी और अंग्रेेजी भाषा का प्राथमिक ज्ञान देना होता हैं। दृष्टिबाधित दिव्यांगता के विशेष शिक्षक मृदुल राय बताते हैं कि पूर्ण और आंशिक रूप से दृष्टिबाधित बच्चों के हाथों में महसूस करने की क्षमता विकसित करने के लिए उन्हें प्रशिक्षित किया जाता है। इसके बाद उन्हें ब्रेल लिपि सिखाई जाती है। दस महीने में बच्चा इतना सीख जाता है कि अगर उसे सामान्य स्कूल में सहयोग मिलता रहे तो वह अच्छा विकास कर सकता है।
महत्वपूर्ण कैंप के प्रति अफसर गंभीर नहीं
जीजीआईसी के पुराने भवन में हर साल यह कैंप लगता है। सत्र 2017-18 के लिए इसका बजट 15 लाख रुपये है पर सीलन भरे भवन की मरम्मत, पुताई, और परिसर में लगे कूड़े के ढेर तक नहीं हटवाए गए हैँ। समेकित शिक्षा की समन्वयक शिल्पी श्रीवास्तव अब जाकर एस्टीमेट बनवा रही हैं। मेस के लिए टेंडर न हो पाने से अभी खाना भी बाहर से आ रहा है। छत पर फट-गल चुके पुराने बिस्तरों को सुखाया जा रहा है। सर्दियों में विशेष बच्चे इन्हीं बिस्तरों पर ही सोएंगे हालांकि हर साल इसके लिए बजट आता है। 60 सीटों के आवासीय कैंप को शुरू हुए करीब महीने भर बाद भी बमुश्किल 16-18 बच्चों का ही दाखिला हुआ था। कैंप में मीरगंज, क्यारा, शेरगढ़ और भदपुरा ब्लॉक से चार शिक्षक तैनात किए गए हैं लेकिन इन ब्लॉकों में विशेष शिक्षकों के कई पद रिक्त पड़े हैं।
कैंप करके आए पर अब भटकने को मजबूर दिव्यांग
हम उन बच्चों से मिले जो वर्ष 2016-17 में कैंप कर चुके हैं। प्राइमरी स्कूल कटघर में पंजीकृत मूकबधिर अजय (15) और निखिल (13) भटकने को मजबूर हैं। 130 विद्यार्थियों की जिम्मेदारी अकेली संभाल रही इंचार्ज शौकिया आदिल का कहना है कि इतने बच्चों की जिम्मेदारी के बीच विशेष बच्चों को संभालना बहुत मुश्किल है। उन्हें कोई ट्रेनिंग भी नहीं दी गई हैै। अजय की मां ममता बड़ी उम्मीद से मिलने आईं कि बेटे की पढ़ाई का समाधान निकल आएगा। बताने लगीं कि एक साल कैंप में रहकर बेटा बहुत कुछ सीखा, जुलाई में एक मैडम उसका प्राइमरी स्कूल में प्रवेश करा गईं लेकिन इस स्कूल में बेटा रुकता ही नहीं। फल का ठेला लगाने वाले कल्लू बेटे निखिल की लिखावट वाला एक कागज दिखाकर कहने लगे- ‘कैंप से उम्मीद जगी थी कि लल्ला का भविष्य सुधार लेंगे पर अब भटक रहे हैं।’
सामान्य शिक्षक नहीं ले रहे हैं दिलचस्पी
सप्ताह में सिर्फ दो बार गिने चुने स्कूलों में शैक्षिक सहायता देने पहुंच रहे विशेष टीचरों का प्रभाव समझने के लिए हम प्राइमरी स्कूल खदना पहुंचे। प्रधानाचार्या शाहीना बताती हैं कि यहां पढ़ रहे तीन मानसिक दिव्यांग और तीन मूक-बधिर बच्चे पूरे सप्ताह अपनी विशेष टीचर अनीता दीदी का इंतजार करते हैं। यहां पढ़ रहे मूक बधिर बच्चे साजिया और उबैस ब्लैक बोर्ड पर लिखी इबारत को कॉपी पर उतारना सीख गए हैं। दो साल पहले सहायक अध्यापक पदों पर नियुक्ति हुई तब उन्हें विशेष बच्चों की पढ़ाई के लिए सात दिन का प्रशिक्षण दिया गया। पहले से कार्यरत शिक्षकों के पास विशेष बच्चों को पढ़ाने का कोई कोई तकनीीकी ज्ञान नहीं है। स्कूलों में आने वाले मानसिक दिव्यांग और दृष्टि बाधित बच्चों की स्थिति तो बेहद दयनीय है।
3411 विशेष बच्चों पर हैं मात्र 38 शिक्षक
इस शैक्षिक सत्र में हुए सर्वे के मुताबिक जिले में 3411 विशेष बच्चे हैं, जबकि जिले में इनके सापेक्ष शिक्षक बहुत कम हैं। मानसिक दिव्यांगता के 18, मूक बधिर और दृष्टि बाधित बच्चों को पढ़ाने के लिए 16-16 शिक्षकों के अलावा 43 संविदा शिक्षकों के पद हैं। इनमें से पांच पद खाली हैं। शिक्षा का अधिकार के तहत 30 सामान्य बच्चों पर एक शिक्षक होना चाहिए। विशेष बच्चों में यह अनुपात सात बच्चों पर एक शिक्षक का है, लेकिन जिले ही नहीं देश भर में विशेष शिक्षकों की कमी है। मात्र 12 हजार रुपये मानदेय पर इन शिक्षकों को एक दिन में दो स्कूलों में जाकर विशेष बच्चे को शैक्षिक सहायता देनी होती है। व्यवहारिक रूप से इस व्यवस्था में सिवाय परेशानियों के और कुछ नहीं है।
दिव्यांगता की जांच से प्रमाणपत्र तक पड़ता है भटकना
जिला अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट न होने से मूक बधिर बच्चों का चेकअप नहीं हो पाता है। विशेष शिक्षक ‘जीवनधारा’ जाकर चेकअप कराते हैं। मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र में विशेेषज्ञ न होने के कारण यहां मानसिक दिव्यांग बच्चे का आईक्यू टेस्ट नहीं हो पाता। इसके लिए मानसिक अस्पताल या प्राइवेट नर्सिंग होम में जाना पड़ता है। दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनने के बाद बच्चे सरकारी सुविधाएं पाने के योग्य हो सकते हैं पर प्रमाणपत्र में प्रतिशत का खेल किया जाता है। अभिभावक बताते हैं कि 50 प्रतिशत से अधिक दिव्यांगता होने पर भी उन्हें प्रमाणपत्र के लिए रिश्वत देनी पड़ती है।
इन अक्षमताओं पर किसी का ध्यान नहीं
विशेषज्ञ बताते हैं कि मानसिक मंदित बच्चों को लेकर अभिभावक भी लापरवाह हैं, जिस कारण ऐसे बच्चों की सबसे दयनीय स्थिति है। जिले में ऐसे बच्चों की सबसे अधिक संख्या है। आम सोच है कि ऐसे बच्चे पढ़ लिख नहीं सकते, इसलिए उनकी शिक्षा में न अभिभावक दिलचस्पी लेते हैं न शिक्षक। दृष्टि बाधित बच्चों के लिए मंडल भर में कोई निजी और सरकारी स्कूल नहीं है। बचपन डे केयर में दृष्टि बाधित बच्चों के लिए पद हैं पर वहां शिक्षक न होने से दाखिले नहीं लिए जाते। ऐसे बच्चों को सामान्य स्कूलों के शिक्षक भी ‘बेचारेे’ ही मानते हैं। उन्हें ब्रेल लिपि का प्रशिक्षण भी नहीं दिया जाता है।
सरकारी विशेष स्कूल खस्ताहाल
यूं तो सरकारों ने विशेष बच्चों के लिए सामान्य स्कूल के दरवाजे खोल दिए हैं पर यहां की व्यवस्थाएं बहुत बदतर हैं। राजकीय मूक बधिर विद्यालय कक्षा आठ तक है, लेकिन यहां शिक्षकों के कई पद रिक्त हैं। तीन सौ विद्यार्थियों की क्षमता वाले इस स्कूल में हर साल आधी सीटें खाली रह जाती हैं। दिव्यांग जन विकास विभाग ने वर्ष 2009 में प्री नर्सरी पैटर्न पर बचपन डे केयर खोले। इनमें दृष्टि बाधित, मूक बधिर और मानसिक दिव्यांगता वाले तीन से सात वर्ष तक के तीनों प्रकार की दिव्यांगता वाले बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था है, लेकिन यहां सिर्फ मूक बधिरता के ही विशेष शिक्षक नियुक्त हैं।
निजी विशेष स्कूल पेश कर रहे नजीर
दिशा स्कूल
वर्ष 1998 से संचालित ‘दिशा विद्यालय’ में हर साल 350 बच्चे प्रशिक्षण पाकर निकलते हैं। दिल्ली से आकर बरेली में विशेष बच्चों के जीवन को दिशा देने के उद्देश्य से स्कूल खोलने वाली पुष्पा गुप्ता बताती हैं कि दसवीं तक पढ़ाई के साथ यहां बच्चों को वोकेशनल ट्रेनिंग भी दी जाती है। यहां सिलाई, ब्यूटीशियन, इलेक्ट्रिॉनिक्स जैसे कोर्स करके विशेष विद्यार्थी अपने पैरों पर खड़े हुए हैं।
जीवनधारा पुनर्वास एवं शोध संस्थान
वर्ष 1992 में शुरू हुए जीवनधारा पुनर्वास एवं शोध संस्थान से हर साल पांच सौ बच्चे विशेष स्पीच प्रशिक्षण प्राप्त कर निकलते हैं। यहां से प्रशिक्षण लेकर निकले कई विशेष बच्चे सामान्य स्कूलों में पढ़ रहे हैं। संस्थान के समन्वयक इकराम बताते हैं कि बाहर के जिलों के भी बच्चे यहां प्रशिक्षण ले रहे हैं। प्रशिक्षण पाकर ये बच्चे श्रवण मशीन के साथ सामान्य स्कूलों में 90 प्रतिशत सुगमता के साथ पढ़ पाने में सक्षम हैं।
विशेष बच्चों को सामान्य बच्चों के बीच मुख्यधारा स्कूल में पढ़ाने पर उनका विकास ज्यादा तेजी से होता है। दरअसल उन्हें रहना तो समाज में सामान्य लोगों के बीच ही है। समस्या यह है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक विशेष बच्चों को पढ़ाने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं हैं। इस संबंध में अब कदम उठाए जा रहे हैं, बीएड में विशेष बच्चों पर एक पेपर जोड़ा गया है। दूसरी ओर, विषय शिक्षक सिर्फ एक प्रकार की दिव्यांगता के ही विशेषज्ञ हैं। अब भारतीय पुनर्वास परिषद ने निर्णय लिया है कि उन्हें तीनों दिव्यांगताओं के शिक्षण के लिए तैयार किया जाएगा।
- प्रो. अमिताभ मिश्र, भारतीय पुनर्वास परिषद की कमेटी के चेयरमैन एवं जीवन धारा संस्था के चेयरमैन