नगर निगम के चुनाव में भाजपा के कमल को मुरझा डालने में बागियों ने कोई कमी बाकी नहीं छोड़ी। दरअसल, भाजपा से मेयर पद का चुनाव लड़ने के लिए एक नहीं 37 दावेदार थे, जिनमें सात तो पार्टी के कैडर से जुड़े नेता थे। इन्हें बागी तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन पूरे तरह मन से ये लोग उमेश गौतम के साथ नहीं आ सके। हालांकि पार्षद के टिकट के 32 दावेदार तो न सिर्फ चुनाव मैदान में उतरे बल्कि भाजपा की खुली मुखालफत भी करने से पीछे नहीं रहे।
बड़ी सरकार के कद्दावर मंत्री के एक करीबी समेत पार्टी के कई नेताओं ने मेयर पद के टिकट पर प्रबल दावेदारी की थी। दावेदारों में छोटी सरकार के कद्दावर मंत्री के करीबी एक होम्योपैथिक डॉक्टर भी टिकट की लाइन की पहली पंक्ति में खड़े थे। बदायूं रोड पर अस्पताल चलाने वाले डॉक्टर कैडर का होने की वजह से अपनी दावेदारी सबसे मजबूत बता रहे थे। दूसरे डॉक्टर और बड़े अस्पताल के मालिक की भी टिकट को लेकर दावेदारी किसी से कम नहीं थी, लेकिन इन्वर्टिंस विश्वविद्यालय के कुलपति उमेश गौतम को संगठन पर अपनी मजबूत पकड़ होने की वजह से टिकट मिल गया। उमेश गौतम ने मेयर के टिकट के नौ दावेदारों को तो किसी तरह राजी करके अपने साथ कर लिया। संगठन के दबाव में ये सब उमेश गौतम के साथ कभीकभार चुनाव प्रचार में नजर तो आए, लेकिन वोटरों को ठीक से साध नहीं पाए। बाकी दावेदार उमेश गौैतम की हां में हां तो मिलाते रहे, लेकिन उनके लिए वोट मांगने नहीं निकले, उल्टे मेयर के टिकट को लेकर गाहे बगाहे सवाल खड़े करते रहे।
बुधवार को मतदान के दिन भी मेयर पद के बागी खुद तो वोट डालने निकले, लेकिन पार्टी के दूसरे मतदाताओं को वोट डालने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया। उधर, पार्षद का टिकट न मिलने से बागी हुए 32 दावेदारों ने बरेली विकास मोर्चा के नाम से बागियों का संगठन बना लिया। इनमें 17 तो निर्दलीय प्रत्याशियों के तौर पर चुनाव मैदान में भी उतरे। उन्होंने अपने लिए तो वोट मांगे ही, भाजपा को मेयर के चुनाव में भी नुकसान पहुंचाया। इनमें से कुछ प्रत्याशियों ने तो भाजपा के टिकट वितरण करने वाले नेताओं पर सवाल खड़े कर दिए।