प्रवासियों के लौटने के साथ बढ़ता जा रहा है नए राशन कार्ड बनाने का दबाव
बरेली। कोरोना के शिकंजे में कसे हजारों गरीबों के लिए राशनकार्ड की जरूरत जिंदगी और मौत का सवाल बनती जा रही है लेकिन सिस्टम के लिए नए राशन कार्ड बनाना भी उतना ही मुश्किल हो रहा है। यूं तो सप्लाई विभाग के पोर्टल पर सिर्फ तीन हजार ही ऑनलाइन आवेदन लंबित हैं लेकिन शिकायतों के आधार पर अनुमान लगाया जाए तो यह संख्या कई गुना ज्यादा हो सकती है। दूसरे, इनमें वे लोग भी शामिल नहीं हैं जो हाल ही में दूसरे शहरों से बेदखल होकर गांवों में लौटे हैं। चिंता की बात यह है कि मुफ्त राशन बांटे जाने की वजह से सरकारी गोदामों का स्टॉक लगातार कम हो रहा है। जिला प्रशासन की ओर से आर्थिक तौर पर मजबूत लोगों से अपने राशन कार्ड सरेंडर करने की अपील की जा रही है लेकिन अब तक एक भी राशन कार्ड सरेंडर नहीं हुआ है।
प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक जिले में अप्रैल से मई तक करीब आठ लाख अंत्योदय और पात्र गृहस्थी के राशन कार्डों पर जरूरतमंदों को हजारों टन सस्ता या मुफ्त राशन दिया जाना है। अप्रैल और मई में 15-15 दिन के अंतर पर दो बार राशन बांटा जा चुका है। सरकार की चिंता है कि बड़े पैमाने पर मुफ्त राशन बांटे जाने से सरकारी गोदामों में तेजी से स्टॉक कम हो रहा है। इसी के मद्देनजर प्रशासन चाहता है कि ऐसे लोग अपने राशन कार्ड सरेंडर करें जिन्हें उनकी जरूरत नहीं है। कई दूसरे जिलों में सैकड़ों लोगों ने अपने राशन कार्ड सरेंडर किए हैं लेकिन बरेली में अब तक पूर्ति विभाग को इस संबंध में एक भी आवेदन नहीं मिला है। ऐसे में पूर्ति विभाग के उस अभियान पर भी सवाल उठ रहा है जो हर साल अपात्रों के राशन कार्ड रद्द करने के लिए चलाया जाता है।
गांव-गांव राशन कार्ड को तरस रहे लोग रिकॉर्ड में लंबित आवेदन सिर्फ 2500
लॉकडाउन के बाद ग्रामीण इलाकों में राशन कार्ड बनाने की मांग तेजी से बढ़ी है लेकिन पूर्ति विभाग पहले से लंबित 2553 उन आवेदनों पर ही फैसला नहीं ले पा रहा है जो ऑनलाइन किए गए थे। शहरी क्षेत्र में ऐसे आवेदनों की संख्या 250 बताई गई है। हालांकि असल में शहर से लेकर देहात तक राशन कार्ड के लिए तरस रहे लोगों की संख्या इन आंकड़ों से तमाम गुना ज्यादा है। अब चुनौती इसलिए और बढ़ी है क्योंकि घर लौटे प्रवासी मजदूर और उनके परिवारों की ओर से भी बड़े पैमाने पर राशनकार्ड की मांग शुरू हो गई है। पूर्ति विभाग के आंकड़ों का यकीन किया जाए तो लॉकडाउन के बाद अब तक करीब 15 हजार नए राशनकार्ड बनाए जा चुके हैं।
नया संकट: अतिरिक्त राशन बांटने की वजह से खाली होने लगे गोदाम
जिले में 99687 अंत्योदय और 693000 पात्र गृहस्थी के राशनकार्ड हैं। इन करीब आठ लाख लोगों को राशन की 1800 दुकानों से हर महीने एक लाख सात हजार क्विंटल गेहूं और 72 हजार क्विंटल से ज्यादा चावल सस्ती दर पर बांटा जाता है। लॉकडाउन में सभी राशन कार्ड पर प्रत्येक यूनिट पर पांच किलो अतिरिक्त राशन दिए जाने से हजारों क्विंटल का वितरण बढ़ गया है। बताया जा रहा है कि इस वजह से सरकारी गोदामों का स्टॉक तेजी से कम हो रहा है।
सरकार के मानक के मुताबिक शहर में 64 प्रतिशत आबादी और ग्रामीण क्षेत्र में 79 प्रतिशत आबादी के पास राशन कार्ड होना चाहिए। इस मानक को धीरे-धीरे पूरा किया जा रहा है। पात्रों के नए राशन कार्ड बनाने के लिए सभी कार्ड वालों की नए सिरे से जांच कराकर अपात्रों को हटाया जाएगा। अब जिले में राशन कार्ड सरेंडर करने के लिए एक भी आवेदन नहीं आया है। -सीमा त्रिपाठी, जिला पूर्ति अधिकारी
हजियापुर में पकड़ा गए राशन को सरकारी माना.. फिर भी कोटेदारों को क्लीन चिट
बरेली। राशन के घोटालों पर सिस्टम के ही हाथों लीपापोती कर दिए जाने का सिलसिला पहले से काफी लंबा है, लॉकडाउन के बीच हजियापुर में सरकारी राशन पकड़े जाने के बाद भी ऐसा कर दिया गया। माफिया पर धारा 3/7 के तहत केस दर्ज कराया गया लेकिन जांच की रस्म अदायगी कर इलाके के कोटेदारों को क्लीन चिट दे दी गई। यह भी पता नहीं लगाया गया कि कोटेदारों ने गड़बड़ी नहीं की तो सरकारी राशन आया कहां से।
पिछले दिनों हॉटस्पॉट रहे हजियापुर में पुलिस और पूर्ति विभाग ने आजिम नाम के एक शख्स के पास 27 कट्टों में 13.5 क्विंटल चावल, दो कट्टों में गेहूं और सात कट्टों में आटा बरामद किया था। घर के बाहर खड़ी एक गाड़ी में भी चावल के 40 और कट्टे मिले थे। यह पुष्टि भी हुई यह सरकारी राशन था और आजिम ने भी स्वीकार किया कि वह राशन कार्ड धारकों से ही सस्ता गेहूं खरीदकर उसके आटे के पैकेट बाजार में बेचता था। इसी तरह मुफ्त मिला चावल भी बाजार में बिक रहा था लेकिन इसके बावजूद पूर्ति विभाग की जांच यह साफ नहीं कर पाई कि आजिम के पास सरकारी राशन कहां से आया।
डीएसओ सीमा त्रिपाठी के मुताबिक उन्होंने हजियापुर के तीन कोटेदारों के स्टॉक की जांच कराई लेकिन किसी कोटेदार का स्टॉक कम नहीं मिला। लिहाजा तीनों को क्लीन चिट दे दी गई। इस आशंका को भी बगैर जांच के ही दरकिनार कर दिया गया कि सरकारी राशन का यह खेल फर्जी राशन कार्डों पर ही चल रहा था।
इस मामले में कोटेदारों के स्टॉक की जांच कराई गई थी लेकिन वहां कोई गड़बड़ी नहीं मिली है। मामले की एफआईआर दर्ज है। बाकी पुलिस भी जांच कर रही है।-सीमा त्रिपाठी, डीएसओ