नियमित अभ्यास व खेल की समझ से ग्रामीण परिवेश से निकले खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर बिखेर रहे चमक
बरेली। अखाड़ों में दांव-पेच सीखकर ग्रामीण परिवेश के खिलाड़ी मैट पर पदक जीत रहे हैं। पारंपरिक अखाड़ों की सख्त दिनचर्या और आधुनिक खेल विज्ञान का मेल इन खिलाड़ियों की सबसे बड़ी ताकत है। नंगे पांव मिट्टी में दांव-पेंच सीखकर शरीर और मन को मजबूत करने वाले कई खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना रहे हैं।
मैदान से दूरी बनाने के बाद फिर की वापसी
मीरगंज की जूडो खिलाड़ी आंचल खान ने खेल की शुरुआत मिट्टी में अभ्यास से की थी। पिता के निधन के बाद पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें कुछ समय के लिए खेल से दूरी बनानी पड़ी, लेकिन फिर मैदान पर वापसी की। आंचल बताती हैं कि शुरुआती दौर में मिट्टी में अभ्यास करने से शरीर की मजबूती और संतुलन बेहतर हुआ।
विरासत में मिली पहलवानी
फरीदपुर के 22 वर्षीय दीक्षांत बताते हैं कि उनके परिवार में पहलवानी और कुश्ती की परंपरा रही है। उन्होंने अखाड़े में कुश्ती से शुरुआत की और समय के साथ जूडो और ग्रेपलिंग जैसे आधुनिक खेलों में खुद को निखारा। वर्ष 2025 में विश्वविद्यालय में आयोजित ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी ग्रेपलिंग प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण व रजत पदक जीतकर अपनी प्रतिभा साबित की।
प्राकृतिक डाइट व अभ्यास है सफलता की कुंजी
फरीदपुर के ही 21 वर्षीय लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने आर्मी की तैयारी के उद्देश्य से खेलों में कदम रखा। उन्होंने बजरंग अखाड़े में मिट्टी पर अभ्यास किया। वे बताते हैं कि अखाड़े में मिट्टी से शरीर मजबूत होता है। चोटों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। वहीं, मैट पर अभ्यास करने से तकनीकी कौशल निखरता है। ऑल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी ग्रेपलिंग प्रतियोगिता में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था। संवाद