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आईसीयू में भी आंखों में आंसू.. अब कैसे भरेगा बच्चों का पेट

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hadsa shimla
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मजदूरी के साथ मंडी में खराब सब्जियां बीनकर परिवार का पेट भरती थी महिलाएं, एक की मौत के बाद दूसरी के भी अपंग होने का खतरा
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बेवा थी हादसे में मारी गई महिला, अनाथ हो गए बच्चे

बरेली। लापरवाही से कार चलाने की वजह से उसके नीचे आकर कुचली गई तीनों महिलाएं अपने परिवार का पेट भरने की जिम्मेदारी उठा रही थीं। हादसे में मारी गई महिला के पति की पहले ही मौत हो चुकी थी जिसके बच्चे अब अनाथ हो गए हैं। बाकी दो जो अस्पतालों में भर्ती हैं, उनमें से भी एक के अपंग होने का खतरा है। आईसीयू में भर्ती यह महिला अर्द्धबेहोशी की हालत में भी इसलिए परेशान थी कि लॉकडाउन में वैसे ही जीना मुहाल था, अब आगे उसके बच्चों का पेट अब कैसे भरेगा।

कुचलने वाले को चीता पुलिस ने पकड़ लिया था मगर छोड़ दिया

दिन भर मजदूरी के बाद मंडी से सब्जियां भी बीन लाती थीं शांति तब चलता था घर
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जिला अस्पताल में भर्ती शांति देवी अपेक्षाकृत कम घायल हैं। उन्होंने बताया कि वह किला के चंदननगर में रहती हैं, उनके पति सत्यपाल मंडी में ही पल्लेदारी करते थे। पूरे लॉकडाउन काम नहीं मिला तो घर बैठे हुए हैं। कई दिनों से वह आढ़तों पर सब्जी बीनने की मजदूरी करने जा रही थी और जैसे-तैसे दिन भर मेहनत करके सौ-सवा सौ रुपये कमाने के बाद परिवार के पेट भरने का इंतजाम करती थीं। मंडी से लौटते वक्त वहां फेंकी गई खराब सब्जियां भी बीनकर घर ले आती थीं। इसी से परिवार के खाने और दूसरे खर्चों का बंदोबस्त होता था। शांति ने बताया कि दो बेटे और दो बेटी परिवार में हैं। बड़ा बेटा 14 साल तो छोटी बेटी आठ साल की है। बच्चों की पढ़ाई भी तंगी में छूट चुकी है। जिस आढ़ती ने उन्हें कार से कुचला, उसे चीता पुलिस ने पकड़ लिया था लेकिन फिर चुपचाप छोड़ दिया। कल वह परिवार के किसी सदस्य को थाने भेजकर उसके खिलाफ रिपोर्ट कराएंगीं।

पति हैं अपाहिज, आशा देवी ही थीं अपने बड़े परिवार की आशा

चंदन नगर की ही रहने वाली आशा देवी भी इस हादसे में काफी गंभीर रूप से घायल हुई हैं। वह पहले जिला अस्पताल में भर्ती हुई थीं लेकिन बाद में कार से कुचलने वाले आढ़ती ने ही उन्हें सिटी स्टेशन रोड के अस्पताल में भर्ती करा दिया। यहां आईसीयू में भर्ती आशा की देखभाल को उनकी बेटी नन्ही मौजूद थी। नन्ही ने बताया कि पिता एक एक्सीडेंट में अपाहिज हो गए हैं। कई साल से उन छह भाई-बहनों की देखभाल और कमाई की जिम्मेदारी मां के ही कंधों पर है। मां मंडी में मजदूरी के बाद अक्सर वहीं आराम कर लेती थी। वह आढ़त वालों से मांगकर कुछ सब्जी ले आती थी जिससे घर में खाना बनता है। अब मां सही हो पाएगी या नहीं, उसे चिंता सता रही है। परिवार की चिंता में मां की आंखों में भी लगातार आंसू है।
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