कार्यक्रम की शुरुआत वन एवं पर्यावरण मंत्री डॉ. अरुण कुमार, सांसद संतोष गंगवार, पूर्व मेयर डॉ. आईएस तोमर, आईएमए अध्यक्ष डॉ. विनोद पागरानी ने दीप प्रज्ज्वलित कर दिया। प्रदेश समेत दिल्ली से आए विशेषज्ञ चिकित्सकों ने बताया कि कुछ डॉक्टर मरीज को तत्काल रेफर करने के बजाय कई माह अस्पताल में भर्ती कर इलाज करते रहते हैं। बीमारी क्या है इसका पता नहीं होता तो कुछ मामलों में इलाज, उचित दवा व अन्य का अभाव रहता है। मरीज तब रेफर होते हैं जब उनके बचने की गुंजाइश कम रहती है। लिहाजा, मरीज को लाभ न मिलने पर तत्काल रेफर करने का सलाह दी जिससे मरीज कोो बचाया जा सके। कार्यक्रम में साइंटिफिक चेयरमैन डॉ. सुदीप सरन, डॉ. भारती सरन, आईएमए सचिव डॉ. गौरव गर्ग, डॉ. अनूप आर्य, डॉ. बृजेश अग्रवाल, डॉ. अनिल रावत, डॉ. लतिका और डॉ. अतुल अग्रवाल अन्य मौजूद रहे।
हृदय में आ रही सूजन से हो रही सडेन डेथ
वरिष्ठ हार्ट सर्जन डॉ. गौरव महाजन का कहना था कि कोरोना महामारी का फेफड़े और हृदय पर दुष्प्रभाव सर्वाधिक है। जो लोग दो बार कोरोना की चपेट में आए हैं उन्हें हर साल ईसीजी, टीएमटी और स्ट्रेस टेस्ट करवाना चाहिए। कोरोना की वजह से हृदय में सूजन रहती है। लिहाजा, लंबे समय तक यह स्थिति बने रहने पर पहला स्ट्रोक ही जानलेवा होता है। ऐसी मौत को सडेन डेथ कहते हैं।
30 साल के युवा भी ब्रेन स्ट्रोक की चपेट में
वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डॉ. मनीष वैश्य के मुताबिक कोरोना महामारी के बाद 30 साल से अधिक आयु के युवा ब्रेन स्ट्रेाक, हैमरेज और मानसिक बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। माना जा रहा है कि वायरस के दुष्प्रभाव से यह बीमारी तेजी से चपेट में ले रही है। बताया कि नई चिकित्सा तकनीक से अब 70 फीसदी ब्रेन स्ट्रोक के मरीज बच रहे हैं। सरकार से सब्सिडी मिले तो आम आदमी को भी इसका लाभ मिल सकता है।
चौथी स्टेज में भी आंत के कैंसर का इलाज
वरिष्ठ ऑन्कोलॉजी सर्जन डॉ. विवेक मंगला के मुताबिक जंक फूड, धूम्रपान, अव्यवस्थित जीवनशैली से पेट के कैंसर के केस बढ़े हैं। हालांकि, दूसरी स्टेज तक 90 फीसदी, थर्ड स्टेज तक 75 फीसदी और चौथी स्टेज में भी 40 फीसदी इलाज संभव है। कहा कि सही समय पर अगर जांच करा ली जाए तो इससे बचाव संभव है। उन्होंने लंबे समय तक पेट की बीमारी को गैस मानने वालों में कैंसर की आशंका जताई है।
मोटापा बिगाड़ रहा शुगर के मरीज की हालत
वरिष्ठ नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. नीरू पी अग्रवाल के मुताबिक सात में से एक व्यक्ति डायबिटिक है। सही समय पर इलाज न मिलने से किडनी, हृदय, गैंगरीन की आशंका बढ़ जाती है। अभिभावक शुगर के मरीज हैं तो बच्चे 95 फीसदी शुगर की चपेट में आएंगे, इसलिए सावधानी बरतें। नियमित जांच कराएं। इंसुलिन से छुटकारा के लिए नई चिकित्सा तकनीक में इनहैबीटर (दवाएं) आ गए हैं। मोटापा शुगर के मरीजों को और बीमार बनाता है।