बरेली। ‘वन ड्राप, मोर क्राप’ ये स्लोगन भले ही सिंचाई विभाग का है लेकिन सरकारी सिस्टम अब तक इसे मूर्त रूप नहीं दे पाया है। मगर, जैविक खेती करने वाले प्रगतिशील किसान अनिल साहनी ने अपने खर्चे पर 10 एकड़ फसल में स्प्रिंकलर पद्धति से सिंचाई का प्रयोग शुरू करके सरकारी सिस्टम को चुनौती दी है। वह स्प्रिंकलर सिंचाई से धान और गन्ने के खेत में सिंचाई करते हैं। इससे 80 फीसदी तक पानी की बचत हो रही है। फसल की लागत में भी कमी आई है। पौधे भी सामान्य सिंचाई से बेहतर है। इस पद्धति से सिंचाई करने से पानी खेत में नहीं भरता। पौधे को जरूरत के हिसाब से नमी मिलती है।
स्प्रिंकलर पद्धति से सिंचाई करने के लिए फसल के चारो ओर पाइप लाइन बिछाई गई है। उसमें पंपिंग सिस्टम लगाया गया है। ऊपर से चर्खी लगाई है। जब बोरिंग से पानी पाइप लाइन में छोड़ा जाता है तो वह चर्खी 90 मीटर के रेडियस में फसल के चारो ओर घूमकर बारिश की बूंदों की तरह फसल की सिंचाई करती है। पौध में नमी होने पर पानी रोक दिया जाता है। आम, केला या अन्य ऊंचे पेड़ों में सिंचाई के लिए रेनगन और फाग सिस्टम प्रयोग में लाया जा रहा है। रेनगन (बारिश वाली बंदूक) में पानी भरकर पौधे के ऊपर से छिड़काव किया जाता है। औसत दर्जे की ऊंचाई वाले पौधों की सिंचाई में रेनगन और आम, नीम या ज्यादा ऊंचाई वाले पेड़ पौधों की सिंचाई के लिए फागर विधि प्रयोग में लायी जाती है। जैविक खेती के लिए अक्सर नए प्रयोग करने वाले किसान अनिल साहनी के अनुसार सरकार किसानों की आमदनी दो गुनी करने की बात कर रही है लेकिन कृषि और सिंचाई विभाग का सरकारी सिस्टम पुराने ढर्रे से बाहर नहीं निकल पा रहा। वह न तो खुद कुछ कर रहे हैं और न ही किसानों से राय ले रहे हैं। अगर किसानों को फसलों में स्प्रिंकलर सिंचाई के लिए प्रेरित करें तो फसल की लागत में आधे से ज्यादा की कमी आएगी और फसल का उत्पादन भी 15 से 20 फीसदी तक बढ़ जाएगा।
प्रारंभ में थोड़ी महंगी है ये प्रणाली
स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली प्रारंभ में थोड़ी महंगी पड़ती है लेकिन पानी की बचत से दो से तीन साल में लागत वसूल हो जाती है। पाइप लाइन बिछाने, पंपिंग सिस्टम तैयार करने में औसतन एक लाख रुपये प्रति एकड़ लागत आती है। अगर सरकारी सब्सिडी का फायदा किसानों को मिले तो गरीब और मध्यम वर्गीय किसान कम लागत में ये सिस्टम अपने खेत में लगा सकते हैं।