2017 के चुनाव में 11 निर्दलीय प्रत्याशियों ने 22 हजार 99 वोट हासिल किए थे। इसमें निर्दलीय प्रत्याशी राकेश बाबू कश्यप ने आम आदमी पार्टी और पीस पार्टी से भी अधिक वोट लिए थे। राकेश बाबू को 5663 मत मिले थे। दूसरी ओर भाजपा ने यह चुनाव सिर्फ 12 हजार 784 वोटों से जीता था। राकेश बाबू इस बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं।
बड़ों को बनानी होगी अलग रणनीति
पिछले चुनाव में एआईएमआईएम नहीं थी। इस बार उसने प्रत्याशी उतारा है। पिछले चुनाव में आईएमसी से मोहम्मद रजा मैदान में थे। इस बार आईएमसी चुनाव में नहीं है तो इससे बड़े दलों को राहत नहीं मिलने वाली है। पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी के इंजीनियर नवनीत अग्रवाल को 3869 वोट मिले थे। इस बार वह फिर मैदान में हैं।
पिछले चुनाव में आईएमसी, पीस पार्टी और आम आदमी पार्टी को मिलाकर 12 हजार 32 वोट मिले थे। यही प्रदर्शन यदि इन दलों ने फिर दोहराया तो बड़े दलों को अपना मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए किसी और रणनीति पर विचार करना होगा।
अकारण ही नहीं लड़ रहे छोटे दल
निकाय चुनाव में छोटे दलों की दिलचस्पी अकारण नहीं है। यह साल 2024 के लोकसभा चुनाव की जमीन को मजबूत करने और अपनी सियासी जमीन को विस्तार देने के लिए यह एक नींव है।
निकाय चुनाव के प्रदर्शन के बूते और जीत-हार के समीकरण में खुद को फिट कर सियासत में अपना रोल निभाने के सपने को पूरा करने में लगे हैं ताकि 2024 के चुनाव में बड़े दल इन्हें साथ रखकर चलें। छोटे दलों का मानना है कि जितनी सीटें उनके पाले में गिरेंगी, लोकसभा चुनाव में बड़े दलों के बीच उनकी पूछ उतनी ही बढ़ेगी। इसीलिए इन दलों का पूरा ध्यान ही इसपर है कि किसी तरह निकाय चुनाव में हिस्सेदारी मिले।