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UP Nikay Chunav: बरेली में बड़े दलों की मुश्किल बढ़ा सकते हैं छोटे दल, इस बार ओवैसी की पार्टी भी मैदान में

Sun, 30 Apr 2023 11:05 AM IST
मुकेश कुमार राहुल दुबे, अमर उजाला बरेली

सार

इस बार निर्दलीयों की संख्या कम है, जबकि पिछली बार 18 में 10 प्रत्याशी निर्दलीय थे। इस बार निर्दलीय सिर्फ छह प्रत्याशी ही हैं। ये निर्दलीय और छोटे दलों के प्रत्याशी हार-जीत तय करने में बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं। 
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यूपी नगर निकाय चुनाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बरेली में छोटे दल और निर्दलीयों ने पिछले निकाय चुनाव के प्रदर्शन को दोहराया तो बड़े दलों के लिए चुनौती और कठिन हो जाएगी। छोटे दलों में कुछ इस बार चुनाव में हिस्सा नहीं ले रहे हैं, मगर ओवैसी की पार्टी इस चुनाव में दांव आजमा रही है। छोटे दल भले ही खुद जीतने की स्थिति में नहीं है, लेकिन बड़े दलों का गणित बिगाड़ने में इनकी भूमिका अहम हो जाती है। ये दल नगर निगम के अलावा नगर पंचायतों और पालिकाओं में भी अपना दमखम दिखा रहे हैं।

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इस बार के चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा और मुख्य विपक्षी दलों के बीच भले ही मुख्य मुकाबला होने के आसार दिख रहे हों, लेकिन राजनीतिक पंडितों की माने तो छोटे दल और निर्दलीय 2017 के चुनाव से भी बेहतर परिणाम लाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। मेयर पद के लिए इस बार भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस के अलावा एआईएमआईएम और आम आदमी पार्टी समेत 13 प्रत्याशी मैदान में हैं, जबकि 2017 के चुनाव में 18 प्रत्याशी मैदान में थे। 

इस बार निर्दलीयों की संख्या कम 

इस बार निर्दलीयों की संख्या कम है, जबकि पिछली बार 18 में 10 प्रत्याशी निर्दलीय थे। इस बार निर्दलीय सिर्फ छह प्रत्याशी ही हैं। ये निर्दलीय और छोटे दलों के प्रत्याशी हार-जीत तय करने में बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं। इनके प्रदर्शन का नुकसान बड़े दलों को पहले भी उठाना पड़ा है और आगे भी उठाना पड़ सकता है। पार्षद सीट पर भी छोटे दल और निर्दलीय किस्मत आजमा रहे हैं। यहां भी अगर इनका प्रदर्शन अच्छा रहा तो निकायों की बोर्ड और कार्यकारिणी की बैठकों में बड़े दलों के लिए चुनौती बनेंगे।

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2017 के चुनाव में 11 निर्दलीय प्रत्याशियों ने 22 हजार 99 वोट हासिल किए थे। इसमें निर्दलीय प्रत्याशी राकेश बाबू कश्यप ने आम आदमी पार्टी और पीस पार्टी से भी अधिक वोट लिए थे। राकेश बाबू को 5663 मत मिले थे। दूसरी ओर भाजपा ने यह चुनाव सिर्फ 12 हजार 784 वोटों से जीता था। राकेश बाबू इस बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में हैं।

बड़ों को बनानी होगी अलग रणनीति

पिछले चुनाव में एआईएमआईएम नहीं थी। इस बार उसने प्रत्याशी उतारा है। पिछले चुनाव में आईएमसी से मोहम्मद रजा मैदान में थे। इस बार आईएमसी चुनाव में नहीं है तो इससे बड़े दलों को राहत नहीं मिलने वाली है। पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी के इंजीनियर नवनीत अग्रवाल को 3869 वोट मिले थे। इस बार वह फिर मैदान में हैं। 




पिछले चुनाव में आईएमसी, पीस पार्टी और आम आदमी पार्टी को मिलाकर 12 हजार 32 वोट मिले थे। यही प्रदर्शन यदि इन दलों ने फिर दोहराया तो बड़े दलों को अपना मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए किसी और रणनीति पर विचार करना होगा।
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अकारण ही नहीं लड़ रहे छोटे दल

निकाय चुनाव में छोटे दलों की दिलचस्पी अकारण नहीं है। यह साल 2024 के लोकसभा चुनाव की जमीन को मजबूत करने और अपनी सियासी जमीन को विस्तार देने के लिए यह एक नींव है। 

निकाय चुनाव के प्रदर्शन के बूते और जीत-हार के समीकरण में खुद को फिट कर सियासत में अपना रोल निभाने के सपने को पूरा करने में लगे हैं ताकि 2024 के चुनाव में बड़े दल इन्हें साथ रखकर चलें। छोटे दलों का मानना है कि जितनी सीटें उनके पाले में गिरेंगी, लोकसभा चुनाव में बड़े दलों के बीच उनकी पूछ उतनी ही बढ़ेगी। इसीलिए इन दलों का पूरा ध्यान ही इसपर है कि किसी तरह निकाय चुनाव में हिस्सेदारी मिले।
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