राजकीय इंटर कॉलेज का मैदान और आसपास की सड़कें हजरत शराफत मियां के दीवानों से भरी हुईं थीं। इसके बाद भी लब्बैक कहता मजमा उर्स स्थल की तरफ बढ़ता आ रहा था। यहां उर्स-ए-शाह शराफती के स्टेज पर कुरान की तिलावत, नातो मनकबत की गूंज, दीनों इस्लाम और मुशायरे की बुलंद होती आवाजों से पूरा माहौल नूरानी हो रहा था। देखते ही देखते हजरत शाह शराफत अली मियां के अकीदतमंदों का भारी हुजूम इकट्ठा हो गया। इसी बीच करीब साढ़े 11 बजे कुल शरीफ की रस्म शुरू हुई। इसमें हर शख्स दिलों में मन्नत-ओ-मुराद लिए हाथ बांधकर खड़ा नजर आया। मध्याह्न करीब 12 बजे कुल पूरा होने के बाद साहिबे सज्जादा शाह सकलैन मियां हुजूर ने हाजिर, गैरहाजिर और तमाम मुल्क के बाशिंदों की बेहरी और भलाई के लिए दुआ की और अपनी नजरे इनायत से नवाजा।
उर्स-ए-शाह शराफत का बृहस्पतिवार को आखिरी रोज था। एक तरह उर्स स्थल पर भोर तक जलसा चला और दरगाह शरीफ पर रातभर हाजिरी का तांता सुबह भी जारी रहा, वहीं उर्स स्थल पर भी सुबह से उर्स की तकरीब शुरू हो गई। इधर भी बड़ी तादाद में जायरीन जमा थे। यहां तकरीब की शुरुआत पीरो मुर्शिद शाह सकलैन मियां हुजूर की सरपरस्ती में हुई। सदारत मुफ्ती आफाक (कन्नौज) कर रहे थे। महफिल की शुरुआत तिलावते कुरान पाक से की गई। इस मौके पर इलाहाबाद से आए मौलाना जियाउर्रमान अलीमी व मुफ्ती आफाक ने बुजुर्गाने दीन और मुआशरे के हालात पर खिताब किया। इसी तरह मुंबई से आए अख्तर हुसैन ने हजरत शराफत मियां की जिंदगी पर रोशनी डाली। कुल की आखिरी तकरीब में अल्लामा फरहत मियां जमाली, अजीज मियां (भतपुरा), अल्लामा हसन मियां (पीलीभीत), अल्लामा सय्यद शाह नूर मियां (कालपी शरीफ), कासिम मियां (खानकाह नियाजिया), मौलाना सय्यद असलम मियां वामिकी (खानकाह वामिकिया) ने खिताब किया। निजामत प्रो. महमूद उल हसन ने की। आखिर में कुल शरीफ के बाद जायरीन की वापसी शुरू हो गई, जो साहिबे सज्जादा से इजाजत लेकर रवाना होते रहे।