इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटलाइजेशन के इस वैज्ञानिक युग में जब करेंसी को डिजिटल करने की बात की जा रही है तो इसे लेकर उलमा फिक्रमंद हैं। सवाल उठ रहे हैं कि डिजिटल करेंसी की शरई हैसियत क्या है? ये माल है भी या नहीं? इसे लेना-देना जायज है या नहीं? इन पर यहां ताजुश्शरीया अल्लामा अजहरी मियां की ओर से बुलाई गई ‘फिकही कांफ्रेंस’ में दिग्गज उलमा और दानिश्वरों के बीच गंभीर बहस हुई। नतीजा डिजिटल करेंसी को नाजायज करार देने के रूप में सामने आया।
यह फैसला यहां मथुरापुर स्थित इस्लामिक स्टडी सेंटर जमीयतुर्रजा में चल रही ‘फिकही कांफ्रेंस’ में देश-विदेश के लगभग सौ उलमा ने शरीयत की रोशनी में एकराय होकर लिया है। इसका खुलासा घोसी से आए जामिया अमजदिया के संस्थापक मुफ्ती जियाउल मुस्तफा अमजदी ने प्रेसवार्ता में किया। उन्होंने फैसले के पक्ष में रखे गए तर्क के संबंध में बताया कि डिजिटल करेंसी, क्रिप्टो करेंसी (बिट क्वाइन आदि) भौतिक तौर पर मौजूद नहीं है। इसका सारा लेन देन नेट के माध्यम से बर्की खाता (एयर एकाउंट) के जरिए होता है। ये माल की हैसियत में नहीं होता। शरीयत की नजर में इसकी माद्दी हैसियत नहीं है। इसलिए जब डिजिटल और क्रिप्टो करेंसी माल नहीं है तो इसका लेन-देन तथा खरीद-फरोख्त नाजायज है। इसका एक पहलू यह भी है कि डिजिटल करेंसी के पीछे कोई जिम्मेदार नहीं है, न हुकूमत न बैंकिंग। नोट अगर बंद हो जाए तो हुकूमत उतना ही पैसा उपलब्ध कराती है। मगर यह करेंसी अगर कोई कंपनी लेकर भाग जाए या बंद हो जाए तो उस पैसे का कौन जिम्मेदार होगा। इन्हीं मुद्दों पर चर्चा के बाद यह फैसला लिया गया।
इस पर फैसला लेने वाले उलमा में मुफ्ती जियाउल मुस्तफा के अलावा जानशीने ताजुश्शरीया शहर काजी मौलाना असजद रजा खां कादरी, श्रीलंका के मौलाना बाबू रजा, अंबेडकर नगर के शहर काजी मुफ्ती अख्तर हुसैन, इलाहाबाद के मुफ्ती शब्बीर हसन, मुंबई के शहर काजी मुफ्ती महमूद अख्तर, मुफ्ती उजैर आलम, मुफ्ती रफीक आलम, मुफ्ती शहजाद रजा, मुफ्ती बहाउल मुस्तफा, मुफ्ती आलमगीर आदि शामिल रहे। प्रेसवार्ता के दौरान जमात रजा मुस्तफा के उपाध्यक्ष सलमान हसन खां, मुफ्ती शहजाद रजा, आला हजरत ट्रस्ट के मोहतशिम रजा खां भी मौजूद रहे।
नीलामी संपत्ति खरीदने, नमाजी के सामने से गुजरने के सवाल पर भी होगी चर्चा
बरेली। फिकही कांफ्रेंस में अभी दो और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा होनी है। मुफ्ती मोहम्मद शहजाद रजा ने बताया कि इनमें एक बिंदु तो यह है कि हुकूमत की ओर से ऐसी जमीन-जायदाद नीलाम की जाती है जो किसी शख्स के कर्ज न चुका पाने पर जब्त की गई होती है। ऐेसी जायदाद को मुसलमान खरीदें या नहीं? ऐसी जायदाद को खरीदने वाला मालिक होगा या नहीं? अंतिम सवाल है कि बड़ी मस्जिदों में जहां हर वक्त लोग नमाज अदा करते रहते हैं वहां पर नमाजी के सामने से गुजरना सही है या नहीं? जमात रजा मुस्तफा के उपाध्यक्ष सलमान हसन खां ने बताया कि इन सवालों पर फैसला होने के बाद इसे अखबारों एवं किताबों के हवाले से लोगों तक पहुंचाया जाएगा। साथ ही इस पर फैसले की कॉपी सभी दारुल इफ्ता को भेजी जाएगी।