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पशुओं के एंटी बॉडी प्लाज्मा से शोध का विकल्प तैयार कर रहे वैज्ञानिक

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आईवीआरआई - फोटो : सोशल नेटवर्क
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आईवीआरआई अब पशुओं पर वैक्सीन का शोध नहीं करना चाहता

बरेली। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिक वैक्सीन के लिए शोध को पशुओं का इस्तेमाल करने के बजाय उनके एंटीबॉडी प्लाज्मा से शोध करने का विकल्प तैयार कर रहे हैं। आईवीआरआई के मानकीकरण विभाग के वैज्ञानिक काफी हद तक इसमें सफलता भी हासिल कर चुके हैं। कुछ जरूरी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद इस विकल्प को अनुमति देने की तैयारी है।
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आईवीआरआई के ज्यादातर शोध छोटे-बड़े जानवरों से जुड़े रहते हैं। अभी जो नई वैक्सीन तैयार हो रही हैं, वे कितनी असरदार हैं या उनके क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, ये जानने के लिए जानवरों पर ही प्रयोग किए जाते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि मुर्गे, चूहे, खरगोश सहित दूसरे छोटे जानवरों पर दवाइयों के शोध के लिए आईवीआरआई की स्थानीय कमेटी से ही अनुमति मिल जाती है, लेकिन कुत्ता, भैंस, गाय, घोड़ा आदि बड़े जानवरों पर शोध करने के लिए संस्थान को कमेटी फॉर द परपज ऑफ कंट्रोल एंड सुपरविजन ऑफ एक्सपेरिमेंट ऑन एनीमल (सीपीसीएसईए) से अनुमति लेनी होती है। इसकी प्रक्रिया बेहद जटिल और लंबी है। इसके अलावा जानवरों पर वैक्सीन या किसी दवाई का असर जानने में समय भी ज्यादा लगता है। लिहाजा अब जानवरों के बजाय उनके एंटीबॉडी प्लाज्मा से शोध करने का विकल्प तैयार किया जा रहा है। इससे शोध कार्य आसानी से और जल्दी हो सकेगा।

एंटी बॉडी प्लाज्मा से कई वैक्सीन हो चुकी हैं तैयार

आईवीआरआई ने मुर्गियों में लगने वाली रानीखेत और आईबीडी नाम की खतरनाक बीमारी के साथ ही सुअरों में होने वाली क्लासिकल स्वाइन फीवर की वैक्सीन का एंटीबॉडी प्लाज्मा से ही शोध किया है। हालांकि अभी आईवीआरआई को शोध के लिए इस विधि के इस्तेमाल की औपचारिक अनुमति देना बाकी है।

पशुओं पर शोध करने के लिए वैज्ञानिकों को अनुमति लेने की काफी जटिल और लंबी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इसलिए आईवीआरआई इसके विकल्प पर काम कर रहा है। - डॉ. एके तिवारी, विभागाध्यक्ष, मानकीकरण विभाग, आईवीआरआई

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