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साल्ट एक कीमत अलग

Wed, 20 Jan 2016 12:45 AM IST
बरेली
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फार्मूले के खेल से दवा कंपनियां मरीजों को खूब चूना लगा रही हैं। एक ही फार्मूले से अलग-अलग रेट की दवाएं बाजार में बेची जा रही हैं। मरीजों को वही दवाएं चाहिए जो डॉक्टर ने लिखी हैं। भले साढ़े नौ रुपये वाले कैप्सूल की जगह मरीजाें को 60 रुपये की टैबलेट खरीदनी पड़े। डीपीसीओ (ड्रग प्राइज कंट्रोल आर्डर) से बचने के लिए दवा कंपनियों ने फार्मूले में बदलाव किया और दाम अचानक से दस फीसदी बढ़ा दिए। केमिस्ट एसोसिएशन ने इसके खिलाफ स्वास्थ्य मंत्रालय में शिकायत भी की है।
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कंपनियों की कारस्तानी
थायराइड की थायरॉक्सीन 25एमजी की दवा 164 रुपये की 100 गोली है। यही दवा 50एमजी की 116 रुपये में है। इसी तरह कोलेस्ट्रॉल कम करने की दवा एटोरवसटैटिन 68 रुपये की 10 गोली है। इसमें एस्प्रीन नहीं है, इसलिए अलग से एस्प्रीन खरीदने पर इसके दाम बढ़ जाते हैं। वहीं एटोरवसटैटिन में एस्प्रीन मिली टैबलेट 22 रुपये की 10 गोली है।

यह है खेल
डीपीसीओ में दर्ज दवाओं पर सरकार का नियंत्रण है। कंपनियां उन दवाआें का रेट नहीं बढ़ा सकती है लेकिन फार्मूले में बदलाव कर र्नई दवा लांच कर देती हैं। इससे दाम अधिक होते हैं। सरकार का भी इस पर बस नहीं है। खांसी का सेलबुटामाल सिरप नौ रुपये में था। उसमें लीवो सेलबुटामाल फार्मूला बढ़ाकर इसे एकदम से 49 रुपये कर दिया गया।
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कुछ ऐसी ही दवाआें की रेट लिस्ट
दवा                बीमारी            पुराना दाम        नया दाम
सालबुटामाल    खांसी सिरप     09 रुपये        49 रुपये
वीडाग्लीटिन    डायबिटीज      299 रुपये        328 रुपये

(नोट- ये दवाएं डीपीसीओ में दर्ज थीं। इनमें फार्मूला बदला गया तो दाम एकदम से बढ़ा दिए गये।)


एक फीसदी ग्राहक ही मांगते हैं फार्मूले से दवा
महानगर केमिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष दुर्गेश खटवानी का कहना है कि अगर मरीज फार्मूले के नाम से दवा मांगे तो उसे फायदा होगा, लेकिन दवा कंपनियों और डॉक्टराें की सांठगांठ से यह आसान नहीं है। गरीब से गरीब मरीज भी महंगी दवा खरीदने को मजबूर है। दिल्ली एम्स में डॉक्टर फार्मूला लिखते हैं और चार ब्रांड। यही हर डॉक्टर को करना चाहिए।
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