बरेली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसान कल्याण रैली संयोग से उसी रबर फैक्ट्री के मैदान में हो रही है जो 16 साल से बंद पड़ी है और इसके लगभग पांच हजार कर्मचारी तब से वेतन के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। अब जब प्रधानमंत्री 28 फरवरी को यहां पहुंच रहे हैं इसलिए उनको उनसे टूटी आस बंध गई है। कर्मचारियों को लग रहा है कि रबर फैक्ट्री की त्रासदी का हाल जानकर मोदी इसे फिर शुरू कराने का रास्ता निकाल सकते हैं। हालांकि फैक्ट्री चलाने के लिए पहले भी कुछ स्तर पर प्रयास हुए लेकिन नाकाफी रहे।
फतेहगंज पश्चिमी की सिंथेटिक एंड केमिकल्स फैक्ट्री एशिया की सबसे बड़े और नामी उद्योगों में शुमार हुआ करती थी। इसे वर्ष 1957 में 1760 एकड़ जमीन पर सेठ किलाचंद ने स्थापित किया था और 1962 में यहां प्लांट चालू हुआ। इसके लिए अधिकांश जमीन बहुत कम कीमत पर किसानों से खरीदी गई थी। बाकी जगह लीज पर ली गई। इसमें कार्यरत रहे कर्मचारी बताते हैं कि 15 जुलाई 1999 को जब अचानक यह फैक्ट्री बंद की गई तो यह हर साल 14 करोड़ रुपये का लाभ देती थी। बंदी के दौरान फैक्ट्री में ढाई हजार स्थाई और करीब साढ़े तीन हजार कैजुअल कर्मचारी कार्यरत थे। कर्मचारियों ने आंदोलन किया तो प्रबंधन ने वेतन देने का ऐलान किया था लेकिन मालिकान फिर लौटकर नहीं आए। रबर फैक्ट्री मजदूर संघ के अध्यक्ष प्यारेलाल प्रजापति बताते हैं कि वर्ष 2000 में सारे कर्मचारियों का लगभग सौ करोड़ रुपये बकाया निकला था। 2010 में वेतन लगभग 266 करोड़ बना और अब लगभग साढ़े तीन करोड़ रुपया सारे कर्मचारियों के वेतन मद का बकाया होने का अनुमान है। कर्मचारी चाहते हैं कि प्रबंधन के वायदे के मुताबिक सारे कर्मचारियों को अब तक के वेतन का भुगतान हो जाए और फैक्ट्री फिर से चलने लगे। अगर रबर फैक्ट्री न भी चले तो यहां कोई और उद्योग धंधा लगाकर जमीन के उपयोग का रास्ता निकाला जाए ताकि बहुत सारे लोगों को रोजगार भी मिल सके।
त्रासदी की तरह थी फैक्ट्री की बंदी
रबर फैक्ट्री की बंदी इसके सभी पांच हजार कर्मचारियों और उनके परिजनों के लिए बड़ी त्रासदी जैसी थी। जिन परिवारों की इस फैक्ट्री से रोजीरोटी चलती थी, वह सब सड़क पर आ गए। आर्थिक तंगी के हालात में इन परिवारों के सामने भुखमरी का संकट खड़ा हो गया था। तमाम कर्मचारी तो सदमे से मर गए और बहुत सारों को पेटपालने के लिए रोजगार के दूसरे विकल्प तलाश करने पड़े। हालात यह थे कि कर्मचारियों को बीमारी का इलाज कराने को पैसे भी नहीं थे। उनके बच्चों की पढ़ाई भी चौपट हो गई।
मोदी से मिलकर ज्ञापन देंगे कर्मचारी
रबर फैक्ट्री के कर्मचारियों का मानना है कि मोदी का आगमन फैक्ट्री के पुनर्जीवन के लिए सुनहरा मौका है। अगर प्रधानमंत्री ने इसे गंभीरता से लिया तो कोई न कोई रास्ता निकालकर इसे शुरू करने से लेकर कर्मचारियों के अब तक के वेतन का भुगतान भी हो सकता है। इसीलिए कर्मचारी सक्रिय हो गए हैं। रबर फैक्ट्री मजदूर संघ के बैनर तले हुई बैठक में कर्मचारियों ने मोदी से मिलकर उनके सामने मांग रखने का निर्णय लिया। संघ के मंत्री भूदेव कुमार के मुताबिक, सारे कर्मचारी एकजुट होकर मोदी को ज्ञापन देंगे।