रमजान की शुरुआत चिलचिलाती धूम और तेज गर्मी के साथ हुई है। शुक्रवार को पारा 39 डिग्री के पार रहा। इसके बावजूद रोजेदारों के हौसले में कोई कमी नहीं थी। उन्होंने इबादत और रोजमर्रा के काम के साथ 15 घंटे, 14 मिनट का पहला इम्तिहान आसानी से पास कर लिया और कहा कि रोजा तो पता ही नहीं चला कब गुजर गया।
माहे रमजान में अधिकांश लोगों का शुक्रवार को पहला रोजा था। हालांकि देवबंद सिलसिले और शिया मसलक ने एक दिन पहले ही मान लिया था। बहरहाल तेज गर्मी के बावजूद रोजेदारों ने शुक्रवार को पूरी शिद्दत के साथ पहला रोजा रखा। इसमें नौ साल के बच्चों से लेकर 70 साल तक के बुजुर्ग शामिल हैं। पेश है कुछ रोजेदारों से हुई बातचीत के अंश-
सुभाषनगर निवासी नौ वर्षीय शीरीन ने पहली बार रोजा रखा। उसका कहना है कि सुबह में पता नहीं चला, दोपहर में थोड़ी प्यास लगी, गर्मी भी लगी मगर थोड़ी देर बर्दाश्त करने बाद सब ठीक हो गया। शाम को जरा सुस्ती आ गई थीं मगर मेरे भाई समद जो दो ही साल बड़े हैं, उन्हें देख कर हिम्मत बनी रही। उनका भी रोजा था। शाम को जब इफ्तार का वक्त होने लगा तो बहुत अच्छा भी लग रहा था। अब तो हिम्मत आ गई आगे के रोजे भी रखूंगी। फिर इन दिनों स्कूलों की भी छुट्टी है। वह आर्य पुत्री इंटर कॉलेज में कक्षा चार की छात्रा हैं।
गढ़ी मस्जिद के निकट रहने वाली 57 वर्षीय नजमा कमर ने कहा कि हलांकि बेहद गर्मी का मौसम था, दिल में थोड़ी घबराहट थी कि इस उम्र में और ऐसे मौसम में रोजा, बच्चों ने कहा मत रखिए, लेकिन अल्लाह पर बहुत भरोसा था। उसी से हिम्मत मिली और माशा अल्लाह बहुत सुकून से रोजा गुजरा। उन्होंने कहा कि नौजवान आज कल हिम्मत हार जाते हैं लेकिन उन्हें रमजान के पाक महीने और अल्लाह की ताकत पर भरोसा रखना चाहिए। रोजा तो सवाब के साथ ही सभी बीमारियों की दवा भी है।
जसोली निवासी शुमैला जो एक निजी अस्पताल में नर्स हैं। उनका कहना है कि बेशक बहुत गर्मी है मगर ये अल्लाह की इबादत है और वहीं हौसला देने वाला है। ज्यादा पता नहीं चल रहा, क्योंकि सुबह में सहरी के बाद फज्र की नमाज पढ़ी, कुरान की तिलावत की। फिर सुबह 9 बजे से दोपहर 3 बजे तक ड्यूटी पर रहूंगी। फिर घर आ कर जोहर की नमाज अदा करुंगी, इसके बाद इफ्तारी की तैयारी में लग जाएंगे। इस तरह रोजा क्या पता चलेगा।
परवाना नगर कॉलोनी निवासी 12 वर्षीय मोहम्मद हुसैन पिछले दो सालों से रमजान में रोजा रखते आ रहे हैं। उनका कहना है कि उनके पूरे रोजे होते हैं। शुक्रवार को भी काफी गर्मी थी, मगर सब के साथ जुमें नमाज पढ़ने जाने और कुरान की तिलावत में रोजे का पता नहीं चला। अल्लाह का शुक्र है भूख प्यास का एहसान नहीं हुआ।
सुभाषनगर पुरवा बब्बन खां निवासी 65 वर्षीय सलीम अहमद खां का बताना है कि बचपन से अब तक कोशिश रही है कि रोजे पूरे रखें। बस इस बार भी रोजा रखा। सहरी के बाद सुबह फज्र की नमाज अदा की, कुरान की तिलावत की, फिर काम पर चले गए, इस बीच जुमे की नमाज अदा करने मस्जिद गए। असर की नमाज के बाद फिर तिलावत पर बैठ गए और शाम को घर पर आ कर रोजा इफ्तार किया। अल्लाह का शुक्र है शान से पहला रोजा गुजर गया।