बरेली। उर्स-ए-रजवी की रौनक पूरी शहर में छा गई है। रास्ते रजा रजा... या रजा... की सदाओं से गूंजने लगे हैं। दरगाह के सजे गुंबद, गलियां और दरो-दीवार अपनी खूबसूरती से आकर्षित कर रहे है। ऊपर से यहां सजी दुकानें भी इसमें चार चांद लगा रही हैं।
आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी का तीन राजा उर्स रविवार से शुरू हो रहा है। इसमें शिरकत करने के लिए देश विदेश के हजारों जायरीन बरेली की सरजमीन पर पहुंच चुके हैं और आने का भी सिलसिला जारी है। दरगाह से लेकर उर्स स्थल तक बाजार सज गया है। खान पान के होटल से लेकर तबर्रुक, गर्म कपडों और खेल खिलौनों की भी दुकानें लग चुकी हैं। एक तरफ जहां दरगाह की ओर से तैयारियां पूरी हो चुकीं हैं, वहीं प्रशासन ने भी अपनी ओर से व्यवस्थाओं को दुरुस्त कर लिया है। सुरक्षा के इंतेजाम से लेकर बिजली पानी और सड़कों को चमका दिया गया है।
उर्स का आगाज दरगाह प्रमुख अल्हाज मौलाना सुब्हान रजा खां (सुब्हानी मियां) उर्स स्थल इस्लामियां कालेज के गेट पर परचम कुशाई की रस्म शाम को 6 बजे करेंगे। इससे पहले सज्जादानशीन मौलाना अहसन रजा खां कादरी आजम नगर से परचम का जुलूस लेकर दरगाह पहुंचेंगे। वहां से ठिरिया के जुलूस के साथ अल्हाज सुब्हानी मियां की कयादत में जुलूस उर्स स्थल पहुंचेगा। इसके बाद रात 9 बजे से नातिया मुशायरा आयोजित किया जाएगा।
देश का सबसे बड़ा इस्लामी किताबों का लगा मेला
ॎ उर्स-ए-रजवी में लगने वाला किताबों का मेला दुबई के बाद दुनिया में दूसरे स्थान पर है
बरेली। उर्स-ए-रजवी यूं तो खुद में तमाम इतिहास को समेटे हुए है। इसमें एक खासियत यह भी है कि उर्स में यहां लगने वाला इस्लामी किताबों का मेला दुनियां का दूसरे नंबर का है। हिंदुस्तान के एतबार से देखें तो इस्लामी किताबों देश का सबसे बड़ा मेला है।
इस संबंध में टीटीएस के राष्ट्रीय महासचिव मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी ने बताया कि इस्लामी उलूम व फुनून की किताबें मसलन इल्म-ए-फिक ह, हदीस, तफसीर, इस्लामी तारीख आदि विषयों पर आधारित किताबों का सबसे बड़ा मेला दुबई में लगता है। उसके बाद इन किताबों का दूसरा सबसे बड़ा मेला उर्स-ए-रज़वी में लगता है जिसमें लगभग 4 से 5 करोड़ का कारोबार होता है। इस बार भी उर्स में मुंबई, दिल्ली, मेरठ, सहारनपुर, आगरा, मुरादाबाद, रामपुर, बनारस, आजमगढ़, इलाहबाद आदि से लगभग 250 प्रकाशक अपने स्टॉल लेकर आएं हैं।
मुफ्ती सलीम नूरी ने यह भी बताया कि आला हजरत ने सात साल की उम्र से लेकर अपनी जिंदगी में लगभग 1200 सौ किताबें उर्दू में लिखीं हैं। इनका अब अरबी अंग्रेजी बंग्ला, गुजराती, डच, फ्रंच, मोरिशन आदि भाषाओं के अलावा अफ्रीका की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हो चुका हैं। इस्लामी किताबों के साथ इस मेले में आला हजरत के अलावा उनके शहजादों और खानकाह बरकातिया के बुजुर्गों की भी सारी किताबें उपलब्ध रहेंगी।
फिरकापरस्तों की किताबों पर रोक
इस साल हजरत साहिबे सज्जादा ने किताबी मेले के लिए यह निर्देश जारी किया है कि स्टॉल लगाने वाले लोग फि रका परस्तों की लिखी हुई ऐसी किताबों को हरगिज न बेचें जिनमें गुस्ताखाना और भावनाओं को भड़काने वाली चीजें लिखी गयीं हों।
कुल के दिन जायरीन के लिए 100 बसें लगाएगा रोडवेज
दो एंबुलेंस की कई गई है व्यवस्था
बरेली। उर्स ए रजवी के मौके पर आठ दिसंबर को शहर में उत्सव जैसा माहौल है। बाहर से जायरीन आने शुरू हो गए हैं। इसको लेकर विशेष तैयारियां की गई हैं। बिजली विभाग की ओर से कुतुबखाना क्षेत्र की बिजली व्यवस्था को दुरुस्त किया गया है। जिला अस्पताल की ओर से दो एंबुलेंस चिकित्सकीय टीम के साथ कुतुबखाने और मथुरापुर में लगाए गए हैं। रोडवेज ने अतिरिक्त बस की व्यवस्था की है।
रविवार से उर्स की रौनक शुरू हो जाएगी। शनिवार को जंक्शन और रोडवेज स्टेशनाें पर अच्छी खासी भीड़ रही। जायरीनों ने होटल बुक करा लिए हैं। परिवहन निगम के क्षेत्रीय प्रबंधक एसके शर्मा ने बताया कि कुल शरीफ के बाद जायरीन के लौटने के लिए बरेली डिपो 100 अतिरिक्त बसें लगाएगा। यह बसें पुराने बस अड्डे, सेटेलाइट और वर्क शॉप में खड़ी हाेंगी। यहां से आठ दिसंबर को दोपहर बाद जायरीन आसानी से जा सकें इसके लिए कर्मचारी भी तैनात रहेंगे। जिला अस्पताल के वरिष्ठ परामर्शदाता डॉ. डीपी शर्मा ने बताया कि मथुरापुर सीबीगंज और कुतुबखाना में एक मेडिकल ऑफिसर, फार्मासिस्ट, इंटर्न और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के साथ एंबुलेंस तैयार रहेगी।
गुस्ल शरीफ की रस्म हुई पूरी
बरेली। उर्स-ए-रजवी की पूर्व संध्या पर शनिवार को दरगाह आला हजरत पर गुस्ल शरीफ की रस्म अदा की गई। यह रस्म अल्हाज मौलाना मोहम्मद सुब्हान रजा खां (सुब्हान मियां) की सरपरस्ती में और सज्जादानशीन मोहम्मद अहसन रजा खां कादरी की मौजूदगी में अदा की गई।
इस खानकाही और सूफियाना रस्म को ख्वाजा गरीब नवाज अजमेर शरीफ के गद्दीनशीन सय्यद फरीदुल हसन चिश्ती के हाथों पूरा किया गया। इस रस्म में औलादे गौसे आजम शेख सय्यद अब्दुल कादिर कादरी व सय्यद आसिफ मियां ने भी हाथ लगाया। इसमें मजारों पर गुलाब जल से गुस्ल के साथ ही संदल पेश किया गया।
इससे पूर्व फातेहा ख्वानी के बाद पुरानी चादरों को उतार कर गुस्ल दिया गया। इसके बाद दरगाह प्रमुख व सज्जादानशीन ने मजार शरीफ पर नई चादरें पेश कीं। इस दौरान नूरी मियां, मुफ्ती सलीम नूरी, मुफ्ती आकिल, अजमल नूरी, जुबैर रजा खां, शाहिद खां, औरंगजेब खां, परवेज खां, ताहिर अल्वी, मंजूर खां व मारिशस के अली मुर्तजा आदि शामिल रहे।