बरेली। पशुओं के कृत्रिम गर्भाधान से पशुपालकों की आय में इजाफा होने की उम्मीद बढ़ी है। अच्छी नस्ल की बछिया, पड़िया के जन्म से भी दूध उत्पादन में क्रांति आई है। ये विचार पशु पुनरुत्पादन विभाग के विभागाध्यक्ष डाॅ. एमएच खान ने साझा किए। डॉ. खान ने कहा कि पशु कृत्रिम गर्भाधान भविष्य की जरूरत है। आईवीआरआई युवाओं को रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर बेरोजगारी उन्मूलन की दिशा में बेहतर प्रयास कर रहा है। मुख्य रूप से सही समय पर कृत्रिम गर्भाधान, वीर्य का रखरखाव, पशुओं के खान-पान, गोबर, गोमूत्र के प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाता है। वन हेल्थ की दिशा में भी संस्थान में शोध कार्य हो रहे हैं।
पशु पुनरुत्पादन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डाॅ. हरेंद्र कुमार ने गुणवत्ता वाले सीमेन क्रय करने तथा क्रायोकेन में लिक्विड नाइट्रोजन भराने संबंधी जानकारी साझा की। बताया कि विभाग की ओर से कृत्रिम गर्भाधान पर 18 प्रशिक्षणार्थियों का मासिक प्रशिक्षण शुरू हुआ है। आईसीवीपी की ओर से विशेष तकनीकी सत्र आयोजित हुआ। इसके अलावा पालतू पशुओं और पक्षियों की पैथोलॉजी पर वैज्ञानिकों ने विचार साझा किए। जंगली जानवर, फॉरेंसिक पैथोलॉजी और लेबोरेटरी संबंधित विषयों पर भी चर्चा की।
युवाओं में कौशल विकास बेहद जरूरी
संस्थान निदेशक डाॅ. त्रिवेणी दत्त ने कृत्रिम गर्भाधान प्रशिक्षण से युवाओं के कौशल विकास में काफी मदद मिलने की बात कही। इस दौरान संयुक्त निदेशक शैक्षणिक डाॅ. एसके मेंदीरत्ता डाॅ. रेनू, डाॅ. बृजेश, डाॅ. लोकाव्या, डॉ. बृजेश व अन्य मौजूद रहे।
रोगों का पता चलना ही इलाज की शुरुआत
वेटरनरी पैथोलॉजी कांग्रेस में वैज्ञानिकों ने साझा किए विचार
पालतू पशुओं और कुक्कुट में पनप रही नई बीमारियों के निदान एवं नियंत्रण पर चल रही वेटरनरी पेथौलोजी कांग्रेस के दूसरे दिन बृहस्पवितार को भी वैज्ञानिकों ने विचार साझा किए। वैज्ञानिकों ने कहा कि रोगों का पता चलने भर से ही इलाज की शुरुआत हो जाती है। इसके लिए जांच तकनीकी का संचालन और उसके प्रयोग के लिए प्रशिक्षित होना जरूरी है। बीमारी का पता चलने के बाद ही नैदानिकी, वैक्सीन, जांच किट आदि तैयार करने की प्रक्रिया शुरू होती है।