बरेली। त्रिवटीनाथ मंदिर में चल रही संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा के छठे दिन कथाव्यास डॉ. पं. सुरेश शास्त्री ने एकादशी व्रत के महत्व के बारे में श्रद्धालुओं को बताया। कहा, पांच कर्म इंद्रियां और पांच ज्ञान इंद्रियों समेत एक मन को मिलाकर भगवान को अर्पित किया जाने वाला व्रत ही एकादशी व्रत कहलाता है।
कथाव्यास ने भगवान श्री कृष्ण की महारास लीला के बारे में बताया कि जब गोपियां निष्काम हो गईं तब महज छह साल की आयु में भगवान ने गोपियों के साथ महारास रचाया। कहा, भगवान के रास में कहीं भी काम का स्थान नहीं है। महारास से ज्ञान मिलता है कि परमात्मा की भक्ति के लिए पूर्ण रुप से शुद्ध होना पड़ता है। मन, कर्म इंद्रियों और ज्ञान इंद्रियों को प्रभु को अर्पित करने के बाद ही भक्ति और कृपा गोपियों की तरह प्राप्त हो सकती है। कथा व्यास बताते हैं कि भगवान कृष्ण विद्या अध्ययन के लिए गुरु संदीपनी के आश्रम उज्जैन में विद्या प्राप्त करते हैं। गुरु को गुरु दक्षिणा में उनके मरे हुए पुत्र को यमपुरी से लाकर भेंट करते हैं। आरती के साथ कथा का विश्राम हुआ। जानकारी संजीव औतार अग्रवाल ने दी।