बरेली। देवोत्थान एकादशी जिले भर में शुक्रवार को श्रद्धा के साथ मनाई गई। इस मौके पर घर-घर में देव पूजन हुआ। मंदिरों में सामूहिक रूप से पूजा कर चार माह से शयन में लीन देवों को जगाया गया। इसके साथ ही मांगलिक कार्य शुरू हो गए। देवोत्थान एकादशी सभी एकादशी में सर्वोत्तम मानी जाती है।
पर्व के इस मौके पर सांकेतिक रूप से शहर के मोहल्ला माधवबाड़ी समेत अन्य जगहों पर तुलसी-शालिग्राम का विवाह भी संपन्न कराया गया। देवों के जागने के साथ ही शुक्रवार से मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो गई। त्योहार में विशेष रूप से काम आने वाले गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद, आंवला की सैकड़ों दुकानें बाजार में लगी थीं, इन पर दिनभर खरीदारों की भीड़ जुटी रही। इस पर्व के लिए घरों में विशेष साज सज्जा की गई थी। घरों के बाहर रंगोली बनाकर दीप जलाए गए। घरों में तुलसी का शृंगार किया गया। शाम को घरों में परंपरा अनुसार गन्ना, सिंघाड़ा, शकरकंद आदि से पूजा कर देवों को उठाया गया। मान्यता के अनुसार 12 जुलाई को हरिशयनी एकादशी के दिन जगत के पालन की जिम्मेदारी महादेव को सौंपकर भगवान विष्णु चार मास के शयन के लिए चले गए थे। इस दौरान मांगलिक कार्य वर्जित थे। देवोत्थान एकादशी को विधि विधान से देवताओं को उठाकर मांगलिक कार्यों की शुरुआत के लिए उन्हें आमंत्रित किया जाता है। इसके बाद विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत आदि मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो जाती है।
तुलसी विवाह का लाभ
पंडित राजेंद्र तिवारी ने बताया कि यदि किसी विवाहित जोड़े के रिश्ते में कोई समस्या आ रही है तो उन्हें तुलसी विवाह का आयोजन करना चाहिए। ऐसा करने से उनके दांपत्य जीवन में आ रही समस्याओं का निदान हो जाता है। जो लोग शादी के लिए रिश्ते देख रहे होते हैं, उनकी बात पक्की होने की संभावना बढ़ जाती है।
भगवान विष्णु ने वृंदा को दिया था आशीर्वाद
भगवान विष्णु ने असुरराज जलंधर की पत्नी वृंदा का पतिव्रत धर्म तोड़ दिया था, जिसके कारण उसका पति मारा गया था। वैदिक मान्यता है कि इस पर वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप देकर आत्मदाह कर लिया, आत्मदाह वाली जगह पर एक तुलसी का पौधा उग आया। पंडित राजेंद्र तिवारी ने बताया कि भगवान को जब वृंदा के पतिव्रत धर्म को तोड़ने की ग्लानि हुई तो उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि कार्तिक शुक्ल एकादशी को जो व्यक्ति तुलसी का शालिग्राम से विवाह कराएगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।