बरेली। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर देवी अपराजिता की पूजा की जाती है। इस पूजा में मां रणचंडी के साथ रहने वाली योगनियों जया और विजया को पूजा जाता है। अस्त्र-शस्त्रों को सामने रखकर इनकी पूजा की परंपरा रामायण और महाभारत काल से चली आ रही है। इसी क्रम में मंगलवार को शहर के मंदिरों और धार्मिक समितियों ने शस्त्र पूजन कर शत्रु पर विजय की कामना की।
अखलनाथ मंदिर में वैदिक विधान से शस्त्र पूजा हुई। महंत कालू गिरी ने कहा कि बुराई पर विजय पाने के लिए अतिरिक्त साहस के साथ शस्त्र का होना जरूरी है। इस दौरान अलखनाथ मंदिर के कई साधु व संत मौजूद रहे। तुलसीमठ में महंत कमलनयन दास के नेतृत्व में शस्त्र पूजन किया गया। पंजाबी महासभा बरेली ने श्री बांके बिहारी मंदिर के योगा हाल में शस्त्र पूजा की। महासभा के मुख्य संरक्षक गुलशन आनंद ने शस्त्र पूजा का महत्व बताया। अध्यक्ष संजय आनंद ने ऐसे आयोजनों से युवा पीढ़ी को भारतीय संस्कृति से परिचित कराने की जरूरत बताई। यहां अमित अरोरा, सुभाष साहनी व अन्य मौजूद रहे। क्षत्रिय महासभा ने विष्णुधाम कॉलोनी स्थित मंदिर में शस्त्र पूजन किया। प्रधान महासचिव आलोक चौहान संघर्षी ने समाज को सुरक्षित करने के लिए शस्त्रों की जरूरत बताई। यहां महानगर अध्यक्ष जगदीश सिंह कुशवाह, ठाकुर ओमकार सिंह समेत अन्य मौजूद रहे।
शस्त्र पूजन कर हुआ प्रतिभा सम्मान
महाराणा प्रताप सेवा समिति ने बार एसोसिएशन में 31वां दशहरा पूजन और प्रतिभा सम्मान समारोह का आयोजन किया। हवन पूजन से कार्यक्रम का शुभारंभ करने के बाद शस्त्रों की पूजा की गई। फिर मुख्य अतिथि वीर विक्रम सिंह (प्रिंस), रिटायर्ड एसपी राजेश्वर सिंह, इफको आंवला के सीनियर मैनेजर (ऑफीसर्स एसोसिएशन के महामंत्री) राम सिंह, समेत अन्य ने संयुक्त रूप से हाईस्कूल के 99, इंटर के 74, ग्रेजुएशन के छह, पीजी के तीन समेत अन्य पांच छात्र-छात्राओं को सम्मान से नवाजा। कार्यक्रम का संचालन नंदन सिंह ने किया। यहां समिति संरक्षक और पूर्व सांसद राजवीर सिंह ने मेधावियों को नकद पुरस्कार दिया।
नीलकंठ के दर्शन को उमड़े लोग
विजयदशमी पर नीलकंठ दर्शन की आध्यात्मिक मान्यता को देखते हुए अलखनाथ मंदिर में महंत कालूगिरी ने दो नीलकंठ पक्षी परिसर में विचरण के लिए छोड़े। उन्होंने बताया कि दशहरा के दिन नीलकंठ पक्षी के दर्शन काफी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि नीलकंठ भगवान शिव का प्रतीक हैं। जिनके दर्शन से सौभाग्य और पुण्य की प्राप्ति होती है। इसलिए नीलकंठ लोगोें के दर्शन के लिए छोड़े गए।