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सुबह छह से नौ बजे का जलदान पितरों के लिए अमृत समान

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पश्चिम को छोड़कर शेष तीनों दिशाओं में जलदान देता है लाभ
घर में सुख-शांति के लिए दो पीढ़ी तक करना चाहिए श्राद्ध
बरेली। श्राद्ध में सुबह छह से नौ बजे तक पितरों को जलदान करने से जल अमृत बन जाता है, जिससे पितृ प्रसन्न होते हैं और घर में शांति रहती है। जलदान तीनों दिशाओं में करना बहुत ही फलदायक होता है।
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पंडित प्रदीप कुमार चौबे का कहना है कि आमतौर पर लोग अपनी सुविधा के अनुसार दोपहर तक जलदान करते थे। वह सिर्फ परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। जल पहले पहर सुबह छह से नौ बजे तक अमृत, दूसरे पहर सुबह नौ से दोपहर 12 बजे तक दूध और तीसरे पहर दोपहर 12 से तीन बजे तक सादा जल मात्र रह जाता है। तीसरे पहर का जलदान सिर्फ औपचारिकता है। उन्होंने कहा कि जलदान सबसे पहले पूरब दिशा में देवताओं को किया जाता है। उत्तर में ऋषियों और दक्षिण में पितरों को किया जाता है। देवताओं के लिए जल में फूल-चावल, ऋषियों के लिए फूल-जौ और पितरों के लिए फूल-काले तिल डाले जाते हैं। यह जलदान की सबसे उत्तम विधि है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में पीढ़ी जलदान को नकारती जा रही है जिसका दुष्परिणाम कुछ समय बाद उनके सामने होता है। उन्होंने बताया कि माता-पिता के साथ दादी बाबा का श्राद्ध करना चाहिए, जिससे पितर प्रसन्न होते हैं।
श्राद्ध समाज के रीति रिवाज की तरह हैं। उन्होंने कहा कि किसी समारोह में पिता और पुत्र एक साथ शामिल हों, यजमान पिता को छोड़कर पुत्र की आवभगत करे। उसके पिता को खाना न मिले, तब हम जैसा महसूस करेंगे ठीक वैसा ही हमारे पितर भी महसूस करते हैं। उनका सुझाव है कि अगर हम अपनी तरक्की और घर में सुख-शांति चाहते हैं तो हमें दो पीढ़ी तक श्राद्ध करना चाहिए।
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