बरेली। पति की लंबी आयु और परिवार में सुख समृद्धि के लिए रविवार को सुहागिनों ने हरतालिका तीज अखंड व्रत का अनुष्ठान किया। लेकिन, तिथियों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रही। वहीं, ज्योतिषाचार्यों ने तृतीया का मान दो दिनों तक बताते हुए रविवार या सोमवार दोनोें ही दिन व्रत अनुष्ठान किए जाने को शुभ फ लदायी बताया है।
भादों की शुक्ल पक्ष तृतीया को रखे जाने वाले हरतालिका तीज व्रत पर वर्षों बाद तिथियों के हेर-फेर के चलते दो दिनों का मुहूर्त बना है। कुछ पंडित 1 सितंबर को कुछ ने दो सितंबर को व्रत रखने को शुभ फलदायी बताया है। जिसके बाद व्रत कब रखा जाए इस सवाल का जवाब पाने के लिए महिलाएं खासा परेशान हुईं। 1 सितंबर को हरतालिका तीज व्रत का अनुष्ठान करने वाली सुहागिनों ने शनिवार देर रात से ही तैयारी शुरू कर दी थी। अखंड व्रत में दिन भर निराजल व्रत रखने की परंपरा है। ऐसे में सुबह सूर्योदय से पहले ही मुंह मीठा कर अखंड व्रत का अनुष्ठान शुरू किया। शुभ मुहूर्त सुबह 8.30 बजे पूजन कर शाम को सोलह श्रृंगार में सजी सुहागिनों ने मां पार्वती और भगवान भोलेनाथ का पूजन कर अखंड व्रत और परिवार में सुख समृद्धि की कामना की। मां पार्वती को अर्पित सोलह श्रृंगार पुरोहितों को भेंट किए जाएंगे। यही क्रम सोमवार को व्रत धारण करने वाली सुहागिनों का भी रहेगा।
दोनों ही दिन तृतीया का मान
ज्योतिषाचार्य पं विकास उपाध्याय ने बताया कि हरतालिका तीज का व्रत गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले रखा जाता है। एक सितंबर को जब सूर्योदय होगा तो द्वितीया तिथि होगी जो सुबह 8.27 बजे खत्म होगी। फिर तृतीया तिथि लग जाएगी। ऐसे में उन्होंने दोनों ही दिन यानी रविवार और सोमवार को तीज का व्रत करने को फलदायी माना है। वहीं, पं. नीरज शर्मा ने सूर्योदय के बाद ही यानी 1 सितंबर को तृतीया तिथि लगने से उसका मान शास्त्रों के अनुसार बताया है। उन्होंने 2 सितंबर को व्रत धारण करने वालों के लिए तृतीया तिथि का मान नहीं होने की बात कही है।
दो दिनों की परंपरा पंडितों की देन
जन्माष्टमी, मकर संक्रांति और अब हरतालिका तीज व्रत भी दो दिनों का विधान बन रहा है। जो कि गलत है, इससे श्रद्धालु बेवजह परेशान होते हैं। ज्योतिषियों को एक निष्कर्ष निकालकर व्रत अनुष्ठान का नियम बनाना चाहिए ताकि उनपर भरोसा बरकरार रहे। - चंद्रप्रभा, गृहणी, भरतौल
दशहरे की तरह त्योहार चाहे दो दिन या चार दिन मनाए जाएं लेकिन व्रत या अनुष्ठान या पूजन का एक ही मुहूर्त और दिन होना चाहिए। इससे व्रत या अनुष्ठान करने वाले को परेशानी नहीं होगी। दो दिनों के फेर में व्रत रखने के बाद भी उसके फल को लेकर दुविधा बनी रहती है। नेहा, गृहणी, आशियाना कॉलोनी