शोहदों के डर से कई दिन तक स्कूल नहीं जाने वाली धनेली की बेटियों को हिम्मत देने शुक्रवार को अमेरिका की स्काउट गर्ल पूजा नागपाल पहुंचीं। उन्होंने न सिर्फ मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग दी बल्कि छात्राओं को समझाकर उनमें आत्मविश्वास भी जगाया। धनेली की बेटियों के खौफ की दास्तां टीवी पर देखकर पूजा ने डरी हुई लड़कियों का मनोबल बढ़ाने का निश्चय किया था। 18 साल की पूजा ने चार साल की उम्र से ही ताइक्वांडो सीखना शुरू कर दिया था। अमेरिका के लास एंजिलिस की इस स्काउट लड़की ने 2015 की नेशनल यंग वुमन ऑफ डिस्टिंक्शन सहित कई पुरस्कार भी जीते हैं।
नारी सशक्तीकरण के लिए अपने पिता पवन नागपाल के साथ इन दिनों वह भारत भ्रमण पर हैं। चंडीगढ़ में दृष्टिबाधित बच्चों को जूडो कराटे की ट्रेनिंग दे रही थीं तभी बरेली के दुनका में शोहदों के डर से बेटियों के स्कूल न जाने की खबर सुर्खियां बनी। छात्राओं के मन से डर भगाने और शोहदों से लड़ने का जज्बा भरने के लिए उन्होंने तभी वर्कशाप करने का निर्णय लिया। पूजा सेकंड डिग्री ब्लैक बेल्ट हैं और अमेरिका की गर्ल्स स्काउट हैं। उन्हें हाल ही में अमेरिका का गर्ल्स स्काउट गोल्ड अवार्ड मिला है।
वह अब तक हिमाचल और हरियाणा में कई छात्राओं को जूडो कराटे की टिप्स दे चुकी हैं। शुक्रवार को उन्होंने दुनका के कॉलेज में 40-40 के ग्रुप बनाकर छात्राओं को जूडो कराटे की ट्रेनिंग दी। छात्राओं से कहा कि जूडो-कराटे सीखकर शोहदों से डरने के बजाय एकजुट होकर उन्हें मुंहतोड़ जवाब देना सीखें। उन्होंने कहा कि जब आप शारीरिक रूप से मजबूत होंगी तभी पढ़ाई भी कर सकेंगी। इसलिए खुद पर भरोसा करना सीखें।
पूजा के पिता पवन नागपाल ने बताया कि 2013 के आखिरी महीनों में दोनों तीन साल के वीजा पर भारत आए थे। वर्ष 2013 में हिमाचल और 2015 में हरियाणा में छात्राओं को जूडो-कराटे का एक-एक महीने का विशेष प्रशिक्षण दे चुके हैं। उन्होंने बताया कि वह मूलत: पंजाब के रहने वाले हैं। मुंबई और आईआईटी खड़गपुर से इंजीनियरिंग करने के बाद तीस साल पहले वह अमेरिका चले गए थे।
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लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने से खुशी मिलती है : पूजा
पूजा नागपाल का कहना है कि उन्हें लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने में खुशी मिलती है। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद उन्होंनेे भारतीय लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाने को काम शुरू कर किया। पिता सीनियर सेकेंडरी लेबल के स्कूल में शिक्षक हैं। इन दिनों वह चंडीगढ़ में लड़कियों को ताइक्वांडो सिखाकर आत्मनिर्भर बनाने का काम कर रही थीं। इस बीच समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर दुनका की लड़कियों के बारे में देखा तो बेहद दुख हुआ। इसलिए यहां आने का मन बनाया और पिता के साथ चली आईं। वह कहती हैं- मेरा मकसद लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें अपने हिसाब से जीने के लिए तैयार करना है। जरूरत पड़ी तो फिर से दुनका आऊंगी।