बरेली। श्यामगंज चौराहे पर फ्लाईओवर बनने के बाद भी नीचे सड़कों पर जाम क्यों लगता है, अगर किसी जानकार से इस सवाल का जवाब मांगा जाए तो शायद वह पुल बनाने वाले इंजीनियरों को ही इसके लिए जिम्मेदार बताने में हिचकेगा नहीं। दरअसल कम ही लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि पुलों के निर्माण की आधुनिक तकनीक को छोड़कर हमारे इंजीनियर पुरानी तकनीक से ही चिपके हुए हैं। वजह यह है कि नई तकनीक के मुताबिक नापजोख थोड़ा मुश्किल है और उसके लिए माथापच्ची करना उन्हें कबूल नहीं है। कुछ आधुनिक संसाधनों की भी जरूरत पड़ती है जो सरकार मुहैया नहीं करा पा रही है। यही वजह है कि पुरानी तकनीक से बन रहे पुल ज्यादा लागत के साथ अच्छी-खासी जगह घेरकर सड़क को संकरा कर देते हैं और इसकी वजह से ट्रैफिक निकलने के लिए जगह अपेक्षाकृत कम ही बचती है।
इंजीनियरों के मुताबिक पुरानी तकनीक से बनने वाले पुलों के पिलर की गोलाई न्यूनतम 2.5 मीटर की होती है। एक पिलर से दूसरे पिलर के बीच की दूरी भी आमतौर पर 22 से 25 मीटर तक होती है। अगर नई तकनीक को अपनाया जाए तो पिलर की गोलाई बमुश्किल एक या डेढ़ मीटर रहेगी। इसके साथ दो पिलर के बीच की दूरी भी 50 से 60 मीटर तक बढ़ाई जा सकती है। इससे पुल बनने के बाद सड़क का काफी हिस्सा यातायात के लिए उपलब्ध रहता है। लिहाजा ट्रैफिक जाम की गुंजाइश काफी कम हो जाती है।
पुलों के निर्माण में नई तकनीक न अपनाए जाने की वजह यह है कि इसमें पुल की डिजाइन और प्लानिंग दोनों तैयार करने में कुछ ज्यादा मशक्कत करनी पड़ती है। इसके साथ निर्माण सामग्री भी अलग तरह की चाहिए होती है। इसीलिए इंजीनियरों को पुराने ढर्रे पर ही पुल बनाना ज्यादा रास आता है। हालांकि एक वजह यह भी बताई जाती है कि नई तकनीक से पुल की लागत बढ़ जाती है इस कारण इसका बजट मंजूर होना भी एक समस्या रहती है। हालांकि कई शहरों में नई तकनीक से पुलों के निर्माण हो रहे हैं।
कोई भी पुल हो, बरेली शहर की
किस्मत में तो पुरानी तकनीक
पिछले साल श्यामगंज चौराहे पर बनकर तैयार हुए गांधी उद्यान रोड से डेलापीर रोेड को कनेक्ट करने वाले फ्लाईओवर की चौड़ाई करीब नौ मीटर है और नीचे श्यामगंज से शाहदाना के बीच रोड करीब दस मीटर चौड़ी है। पुरानी तकनीकी से बने इस पुल की पिलर की गोलाई ढाई मीटर है। इससे सड़क के बीच काफी जगह पिलर बनाने में ही खप गई है। कई जगह पिलर के साइड में एक से डेढ़ मीटर रोड बाकी बची है जहां दो टेंपो भी आमने-सामने आने पर अड़ जाते हैं। नतीजा यह है कि पुल बनने के बावजूद नीचे दिनभर जाम लगा रहता है। इधर, सेटेलाइट चौराहे पर निर्माणाधीन फ्लाईओवर के लिए भी पुरानी तकनीक ही इस्तेमाल की जा रही है, लिहाजा यही समस्या यहां भी बनी रहने का अंदेशा है। चौड़े पिलर की वजह से सड़क काफी हिस्सा पुल बनाने में ही खप रहा है। चौपुला की तरफ बन रहे फ्लाईओवर में भी नई तकनीकी का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। पुल के पुरानी विधि से बन रहे मोटे पिलर और उनकी दूसरी कम होने से काफी सड़क घिर गई है।