ओपीडी में आने वाले कुल मरीजों में सांस के रोगी 20 फीसदी से भी ज्यादा
प्रदूषण की वजह से त्वचा और नेत्र रोगों से ग्रसित मरीजों की भी बढ़ी संख्या
बरेली। शहर में उड़ रही धूल में सियासी लोग फूल खिलता देख रहे हैं लेकिन फिलहाल धूल क्या असर दिखा रही है, यह नजारा अस्पतालों में देखा जा सकता है। धूल से शहर में हजारों लोगों का दम फूल रहा है। जिला अस्पताल की ओपीडी में मरीजों की तादाद 50 फीसदी से भी ज्यादा बढ़ गई है और करीब 20 फीसदी मरीज सांस रोगों से ग्रस्त होकर पहुंच रहे हैं। धूल-प्रदूषण का दूसरा सबसे बड़ा असर आंखों और त्वचा पर भी पड़ रहा है लिहाजा नेत्र और त्वचा रोग के मरीजों की भी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
जिला अस्पताल के आंकड़े गवाही देते हैं कि जिला अस्पताल की ओपीडी में दो महीने पहले तक हर दिन एक हजार मरीजों के पहुंचने का औसत था जो अब बढ़कर डेढ़ हजार हो गया है। पिछले करीब 15 दिनों से ओपीडी में आने वाले मरीजों की संख्या डेढ़ हजार के भी पार जा रही है। ओपीडी में बैठने वाले डॉक्टरों के मुताबिक इन लोगों में ढाई सौ से तीन सौ तक सांस रोग के मरीज होते हैं। कई बार यह संख्या और भी ज्यादा होती है। यह भी महत्वपूर्ण है कि सांस की दिक्कत की वजह से आने वाले तमाम मरीजों में इस रोग का कोई इतिहास नहीं होता। यानी वे हाल ही में सांस रोग के शिकार हुए होते हैं। त्वचा और नेत्र रोगों की जांच कराने वाले मरीजों की भी दैनिक संख्या दो सौ या उससे ज्यादा होती है।
डॉक्टर शहर में एकाएक सांस, त्वचा और आंखों के मरीजों की संख्या बढ़ने के पीछे गर्मी के मौसम को वजह मानते हैं जिसकी वजह से मौसम में तेज हवाओं के साथ खुश्की भी बढ़ रही है और खुदी हुई सड़कों से धूल के गुबार पहले के मुकाबले काफी ज्यादा उड़ने लगे हैं। इसकी वजह से प्रदूषण का स्तर एक महीने के अंदर ही काफी बढ़ गया है और शहर में निकलने वाला हर शख्स कहीं न कहीं इसकी चपेट में आ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे माहौल में अगर सतर्कता न बरती गई तो प्रदूषण काफी भारी पड़ सकता है। बुजुर्गों और बच्चों के लिए स्थिति और ज्यादा खराब हो सकती है।
धूल से सीने में संक्रमण से लेकर दिल के दौरे तक का खतरा बढ़ा
वायु प्रदूषण का सर्वाधिक असर बुजुर्गों और बच्चों पर
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. पुनीत अग्रवाल बताते हैं कि शहर में ट्रैफि क के अलावा छोटे-छोटे उद्योगों से निकलने वाला धुआं और कई तरह की रसायनिक गैसें पहले से ही वातावरण में मौजूद हैं। इनका असर लोगों में अस्थमा, दिल के दौरे और सीने में संक्रमण के तौर पर देखा जा सकता है। ऊपर से सड़कों पर खोदाई से उड़ रही धूल और बड़ी मुसीबत बन रही है। सबसे ज्यादा बुजुर्ग और बच्चे इसकी चपेट में आ रहे हैं।
प्रदूषण से जाम हो रहे हैं फेफड़े सीने में पैदा कर रहे हैं भारीपन
डॉ. पुनीत के अनुसार धूल के कण सांस की नली के रास्ते अंदर पहुंचकर सीने में भारीपन पैदा करते हैं और फेफड़ों को भी जाम कर देते हैं। इसी वजह से लोगों को सांस संबंधी दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। सांस की नली के जाम होने से जल्द ही असर दिखने लगता है। बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता कम होती है, इसलिए वे जल्द ही सांस रोगों की चपेट में आ जाते हैं। अस्पतालों की ओपीडी बढ़ने की वजह भी मुख्य रूप से वायु प्रदूषण ही है। धूल जिसका प्रमुख कारण है। कई मरीज ऐसे हैं जो लगातार वायु प्रदूषण की चपेट में आकर दमा के मरीज हो गए हैं और उन्हें लगातार इनहेलर लेना पड़ रहा है।
ऐसे करें बचाव
- घर से निकलने के बाद चेहरे पर मास्क लगाए रखें।
- मास्क न हो तो मुंह पर कपड़ा लपेट सकते हैं।
- बाइक पर हेलमेट जरूर लगाएं, कार के शीशे बंद रखें।
फूल खिले न खिले, एक्यूआई फिर जाएगा तीन सौ पार
बरेली। इसी महीने शहर में प्रदूषण का स्तर तीन सौ पार यानी खतरनाक होने तक बढ़ चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि शहर में निर्माण करा रहे विभागों ने फौरन अपनी कार्यशैली में सुधार न किया तो हालात एक बार फिर काफी खराब हो सकते हैं।
बरेली कॉलेज के बॉटनी विभाग के प्रोफेसर डॉ. डीके सक्सेना का कहना है कि अगर इसी तरह धूल उड़ती रही तो जल्द ही एक्यूआई का स्तर एक बार फिर तीन सौ के पार पहुंच जाएगा। विभागों को फौरन सुधार करने की जरूरत है। सभी सड़कों पर लगातार पानी का छिड़काव करने के साथ जो सड़कें खुदी पड़ी हैं, उन्हें तेजी से बनाया जाना चाहिए वर्ना शहरवासियों को इसका गंभीर दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि तेज धूप और हवाओं से वातावरण में नमी का स्तर लगातार कम हो रहा है। इससे प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। उन्होंने कहा कि अफसरों को शहर की इस प्रमुख समस्या पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है।