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ये थाने हैं या कबाड़खाने

Fri, 19 Jun 2015 01:48 AM IST
बरेली
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 शहर के थानों का हाल इन दिनों कबाड़खाने सरीखा हो गया है। सैकड़ों दुपहिया वाहन यहां कंडम हो रहे हैं। धूप, धूल और बरसात झेल रहे इन वाहनों में कई का ढांचा मात्र ही बचा है। इनमें भी लावारिस वाहनों से ज्यादा संख्या मुकदमों में जब्त वाहनों की है जिनके निस्तारण न होने से उनकी सूरत ही बदल गई है।
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सुभाष नगर थाने में ही करीब सवा सौ वाहन थाना परिसर की आधी जगह घेरे पड़े हैं। कुल वाहनों में से सत्तर फीसदी कबाड़ा हो चुके हैं। यह स्थिति तब है जबकि कुछ महीने पहले ही यहां करीब छह सौ वाहनों की नीलामी हुई थी। आधे से ज्यादा वाहनों के मुकदमे लंबित हैं। किसी में एफआर तो किसी में चार्जशीट नहीं लगी है। कई मामले कोर्ट में ट्रायल पर हैं। इनके निस्तारण के बाद ही किसी का मालिकाना हक या फिर नीलामी के लिए शासकीय संपत्ति घोषित होने की कार्रवाई हो सकेगी। प्रेमनगर थाने में भी सौ से ज्यादा वाहन बेहद बुरे हाल में खड़े हैं तो कोतवाली में दर्जनों बाइक मिट्टी में आधी धंसी हैं और इन पर घास उग आई है।

तीन श्रेणी के वाहन
यह वाहन मालखानों में तीन श्रेणी में दर्ज हैं। इनमें लावारिस वाहन हैं जो पुलिस को चेकिंग और अन्य कार्रवाई के दौरान मिलते हैं और फिर इनके मालिक का पता नहीं लगता। दूसरे लादावा श्रेणी के हैं। इनमें वाहन सीज करते वक्त मालिक या चालक मौजूद होता है और बाद में कागजात दिखाने की बात कहकर चला जाता है। फिर न वह लौटकर आता है और न ही सही मालिक का पता लगता है। तीसरी तरह के वाहन एक्सीडेंट या अन्य मुकदमों से जुड़े होते हैं। ये कोर्ट से निस्तारण के बाद ही रिलीज हो जाते हैं।
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ऐसे होता है निस्तारण
पुलिस वाहनों की संख्या के आधार पर संबंधित क्षेत्र के मजिस्ट्रेट से नीलामी का अनुरोध करती है। मजिस्ट्रेट के निर्देश पर पुलिस लाइन का तकनीकी विभाग मुआयना करके इन वाहनों की कीमत तय करते हैं। यहीं से नीलामी की न्यूनतम बोली तय होती है। लावारिस वाहनों को छह महीने के अंदर नीलाम करने की प्रक्रिया है।
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