बरेली। प्लास्टिक कचरा धरती और पर्यावरण का दम घोट रहा है। शहर से रोज करीब 525 मीट्रिक टन कूड़ा निकलता है। इसमें 47 मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा होता है। इसके निस्तारण के इंतजाम नाकाफी हैं। सिस्टम की ईमानदारी और आमजन की भागीदारी के बिना इस चुनौती से निपटना मुश्किल है।
शहर में सिर्फ एक री-साइकिलिंग यूनिट है, जबकि प्रत्येक जोन एक-एक की जरूरत है। पाबंदी के बावजूद श्यामगंज से लेकर शाहदाना तक खुलेआम सिंगल यूज प्लास्टिक की बिक्री हो रही है। फड़ और ठेलेवाले बेधड़क इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
यह स्थिति तब है, जबकि नगर निगम के अधिकारी-कर्मचारी लगातार कार्रवाई और जुर्माना वसूलने का दावा कर रहे हैं। प्लास्टिक का उपयोग कम करने के लिए सौ अधिकारी-कर्मचारी लगाए गए हैं, लेकिन बदलती जीवनशैली और बढ़ती आबादी के कारण इस पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है।
प्लास्टिक की सड़कों के लिए नहीं तय हो सके मानक : नगर निगम, बीडीए और लोक निर्माण विभाग ने सड़कों के निर्माण में प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं किया।
इसके लिए इन विभागों के पास कोई मानक नहीं हैं। अभियंताओं का कहना है कि इसके मानक तय हो जाएं तो इस्तेमाल हो सकता है। लोक निर्माण विभाग के अधिशासी अभियंता भगत सिंह ने बताया कि पांच साल पहले प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में प्रयोग के तौर पर प्रत्येक जिले में एक सड़क के निर्माण में प्लास्टिक का इस्तेमाल हुआ थाा, लेकिन यह आगे नहीं बढ़ सका।
जलस्रोतों भी हो रहे प्रदूषित : पॉलिथीन में कूड़ा भरकर फेंकने से नदियां, तालाब और झीलें प्रदूषित हुईं। इस वजह से शहर के करीब से गुजर रही रामगंगा, नकटिया, देवरनिया, किला नदियों का प्रवाह भी बाधित हो रहा है। इसके अलावा ड्रेनेज और जल निकासी सिस्टम फेल हो रहा है। अधिशासी अभियंता राजीव कुमार राठी बताते हैं कि पॉलिथीन ने सफाई के सिस्टम को बाधित किया है। ब्यूरो