महज चार माह में बना प्लेटफॉर्म, एप भी बनाएंगे
डॉ. तरफदार के मुताबिक प्लेटफॉर्म तैयार है पर इसे सार्वजनिक सर्वर पर शुरू नहीं किया है। भविष्य में इसे मोबाइल एप के रूप में भी विकसित कराया जाएगा। जो किसानों, विद्यार्थियों, फील्ड वर्करों के लिए उपयोगी साबित होगा। महज चार माह में डॉ. अयोन तरफदार के साथ डॉ. शीतल शर्मा, डॉ. अभिनव दीक्षित, डॉ. हर्ष, शोधार्थी सत्यम ने प्लेटफॉर्म बनाया है। भविष्य में अन्य भारतीय पशु नस्लों को भी इसमें शामिल करेंगे।
कॉपीराइट लेंगे पर लोगों के लिए मुफ्त
सहयोगी वैज्ञानिक डॉ. शीतल शर्मा के मुताबिक संबंधित प्लेटफॉर्म का कॉपीराइट लिया जाएगा पर इसका उपयोग कोई भी कर सकेगा। किसानों के लिए यह प्लेटफॉर्म खासा कारगर रहेगा। आईवीआरआई के इंडीजीनियस कैटल ब्रीड आईडेंटीफिकेशन प्लेटफॉर्म पर गाय के चेहरे या सामने से शरीर फोटो अपलोड करते ही नस्ल की सटीकता पता चलेगी। साथ ही, इन गायों की पहचान किस आधार पर की गई, यह भी पता चलेगा।