खेती को मुनाफा देने वाले व्यवसाय में कैसे बदला जाए, इसकी जीती-जागती मिसाल हैं पद्मश्री कंवल सिंह चौहान। 15 वर्ष की आयु में उन्होंने कृषि क्षेत्र की चुनौतियों को समझा और लीक से हटकर काम किया। उनके अनूठे मॉडल से जुड़े क्षेत्र के 10,000 किसानों की आय में तीन-चार गुना तक की वृद्धि हुई है। सोमवार को बरेली के आईवीआरआई में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बातचीत में उन्होंने रसायनों के अंधाधुंध इस्तेमाल पर चिंता जताई। किसानों की आय बढ़ाने के लिए उनका जोखिम कम करने व उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया।
सवाल : पारंपरिक खेती से मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण उद्योग तक का सफर कैसा रहा?
जवाब : वर्ष 1978 से मैंने आय बढ़ाने के उपायों पर काम शुरू किया। 1990 के दशक में मुझे बेबीकॉर्न की खेती के बारे में पता चला। इससे न केवल आय बढ़ी, बल्कि पशुपालन को भी बढ़ावा मिला। वर्ष 1999 में मैंने खाद्य प्रसंस्करण उद्योग लगाने का निर्णय लिया। एक छोटे किसान के लिए यह आसान नहीं था। मुझे इसमें 10 साल लग गए। वर्ष 2009 में पहली इकाई शुरू हुई। आज चार इकाइयां काम कर रही हैं।
सवाल : आपकी प्रसंस्करण इकाइयों ने किसानों के भीतर खेती को लेकर किस तरह का विश्वास जगाया, इसका ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
जवाब : जब हमारी पहली प्रसंस्करण इकाई स्थापित हुई तो हमने किसानों को बेबीकॉर्न, स्वीटकॉर्न, मशरूम और टमाटर जैसी फसलों के लिए न्यूनतम गारंटी मूल्य उपलब्ध कराया। इससे किसानों का जोखिम खत्म हो गया और उनका विश्वास बढ़ा। नतीजा, उत्पादन में भी वृद्धि हुई। ग्रामीण विकास और किसानों की आय में बदलाव के कारण ही मुझे वर्ष 2019 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया।