माधोटांडा (पीलीभीत)। तराई क्षेत्र के शारदा डैम में ठंड बढ़ते ही साइबेरिया सहित कई देशों व पहाड़ी इलाकों से प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इनकी संख्या लगातार घटती जा रही है। डैम में पहले की तरह मेहमान पक्षियों की आवाजेें अब गूंजती नहीं सुनाई देती हैं। विशेषज्ञ प्रवासी पक्षियों की आमद में कमी के पीछे भोजन की कमी और अवैध शिकार मुख्य कारण मान रहे हैं।
पहले की तरह प्रवासी पक्षियों को नहीं मिलता चारा
शारदा डैम में पाई जाने वाली छोटी मछलियां प्रवासी पक्षियों का मुख्य भोजन होती हैं, लेकिन डैम में अब मछली की ब्रीडिंग नहीं हो पा रही है। उसकी वजह वर्ष 1972 के बाद डैम की साफ सफाई ही नहीं कराई गई। बड़ी बड़ी-बड़ी घास उगने से मछलियां घास में भीतर चली गई। ऐसे में ब्रीडिंग न होने से चारे की लगातार कमी होती जा रही है। वहीं दूसरी ओर डैम में गिरने वाली नहर में सिल्ट के साथ लोगबाग खेती करने लगे हैं। इसके चलते प्रवासी पक्षियों को भरपूर चारा नहीं मिल पा रहा है।
पहले बड़ी तादाद में आते थे प्रवासी पक्षी
डैम के आसपास तलहटी में बसे ग्रामीण बताते हैं कि डैम में पहले प्रवासी पक्षी बड़ी संख्या में आते थे। शिकार के दौरान पहले कभी-कभी प्रवासी पक्षी भी मछली जाल में फंस जाते थे, तो उनके पैरों में पीतल के छल्ले होते थे, लेकिन कुछ वर्षों से ऐसा कुछ नहीं दिखता। बताते हैं कि डैम में भीतरी क्षेत्र के कुछ हिस्से में चारे की आज भी अधिकता है, लेकिन वहां भी शिकारियों ने अपनी दस्तक देकर प्रवासी पक्षियों का चोरी छिपे शिकार शुरू कर दिया है।
साल दर साल घटती जा रही है संख्या
जनपद की टरक्वाइज वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसाइटी के सदस्यों ने लाइन ट्रांजेक्ट के माध्यम से कई वर्षों तक प्रवासी पक्षियों का सर्वे किया था। सोसायटी के मुताबिक वर्ष 2001 में संख्या 45000 थी। इसके बाद वर्ष 2002 में 43010, 2003 में 41100, 2004 में 39125, 2005 में 37500, 2006 में 32000, 2007 में 29000, 2008 में 21781, 2009 में 11720 प्रवासी पक्षी ही यहां पहुंचे। इसके बाद सर्वे रोक दिया गया। गत वर्ष गणना मेें 5600 प्रवासी पक्षी पाए गए थे। इस वर्ष गणना नहीं की गई है। फिलहाल सोसायटी अध्यक्ष अख्तर मियां का कहना है कि यह संख्या तबसे लगातार घटती जा रही है।
पक्षियों की सुरक्षा के दावे हवा हवाई
भले ही वन महकमा इस बात का दावा कर रहा हो कि प्रवासी पक्षियों का शिकार रोकने को चौकसी हो रही है, लेकिन यह घोषणा मात्र हवा-हवाई ही है। सच्चाई यह है कि डैम के बाहरी हिस्से में यदि कोई मुखबिरी मिल जाती है तो शिकारियों को पकड़कर कार्रवाई का ग्राफ बढ़ा लिया जाता है। बताते हैं कि कुछ वर्ष शिकारियों ने एक रेंजर और कुछ वनकर्मियों को अपहरण के मुकदमे फंसा दिया था, तब से वन कर्मियों ने इस मामले में कार्रवाई करने से अपने हाथ एक तरह से खींच रखे हैं।
शिकार न रुकने के कई और भी हैं कारण
वन सूत्रों के मुताबिक प्रवासी पक्षियों की शिकार पर रोकथाम के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। इसके चलते डैम के भीतर शिकारियों को पकड़ पाना असंभव है। वहीं दूसरी ओर ह्यूमन नेटवर्क की कमी भी शिकार न रुकने की बड़ी वजह है। ऐसे में शिकारी प्रवासी पक्षियों का शिकार कर उन्हें डैम के भीतर ही भीतर उत्तराखंड की सीमा क्षेत्र में ले जाकर ऊंचे दामों में चोरी छिपे बिक्री कर रहे हैं।
साइबेरियन पक्षी पूर्व की अपेक्षा ही आ रहे हैं, लेकिन प्रवास वाले स्थान पर अनुकूल वातावरण न होने के कारण बिखराव के चलते उनका झुंड नहीं दिख रहा है। पिछले साल इनकी संख्या करीब 56 सौ थी। अभी गणना नहीं की गई है। -अख्तर मियां, अध्यक्ष, वाइल्ड लाइफ कंजर्वेशन सोसायटी
प्रवासी पक्षियों के अवैध शिकार को रोकने के लिए क्षेत्रीय वनकर्मियों को डैम में पैनी निगाह रखने को पूर्व में ही निर्देशित किया जा चुका है। आसपास के ग्रामीणों को भी जागरूक किया गया है। अभी तक अवैध शिकार का कोई मामला प्रकाश में नहीं आया है। -वीके गोयल, वन क्षेत्राधिकारी, बराही रेंज