पीलीभीत। 1990 के रामजन्म भूमि आंदोलन ने देश-प्रदेश के साथ पीलीभीत में भी भगवा राजनीतिक को चमकाया। जब सोमनाथ से अयोध्या तक उस समय भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण अडवाणी ने राम मंदिर के समर्थन में रथयात्रा शुरू की तो उसका असर पीलीभीत में भी पड़ा। यहां राम मंदिर के पक्ष में आंदोलन शुरू हो गया। तत्कालीन मुलायम सरकार में आंदोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। लेकिन आंदोलनकारी जब जेल से बाहर आए तो राजनीति में छा गए। ऐसी राम लहर चली कि 91 के चुनाव में भाजपा ने जिले सभी विधान सभा सीट पर कब्जा कर लिया। लेकिन अगले चुनाव से ही भाजपा को फिर एक-दो सीटों से संतोष करना पड़ा। 26 साल बाद 2017 में भाजपा ने फिर चारों विधानसभा सीटों पर कब्जा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने जब अयोध्या में राम जन्म भूमि पर अपना एतिहासिक फैसला दे दिया तो 1990 में उस समय के आंदोलन का स्मरण स्वाभाविक है। जब देश-प्रदेश के साथ पीलीभीत में भी राम मंदिर आंदोलन चरम पर था। यहां अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की मांग पर बरखेड़ा में क्लीनिक चलाने वाले भाजपा नेता डॉ. परशुराम गंगवार ने उस समय की राष्ट्रीय नेता मेनका गांधी को हराकर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था। हालांकि डॉ. परशुराम गंगवार उसके बाद सांसद नहीं बन सके। वह राम मंदिर आंदोलन में भागीदारी की वजह से 1990 में जेल में रहे थे। 1991 में ही जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव हुए तो राम लहर में कल्याण सिंह की सरकार बनी। उसमें पीलीभीत से राम मंदिर आंदोलन में जेल जाने वाले वीके गुप्ता, प्रमोद प्रधान, किशनलाल और रामसरन वर्मा को भाजपा ने विधानसभा चुनाव में टिकट दे दिया। रामलहर में भाजपा के चारो विधायक भी चुनाव जीत गए। बाद में रामसरन वर्मा कल्याण सिंह सरकार में दुग्ध विकास मंत्री भी बने। उसके बाद भाजपा ने जिला पंचायत पर भी कब्जा जमाया। पार्टी के बुद्धसेन वर्मा पहली बार जिला पंचायत अध्यक्ष बने। सहकारी बैंक अध्यक्ष के तौर पर भाजपा से मनमोहन सिंह ने जीत हासिल की। उसके बाद नगर निकाय चुनाव में भी भाजपा से हरिओम अग्रवाल को नगरपालिका चेयरमैन चुना गया। भाजपा के राजनीतिक उदय ने विरोधियों को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया। अब जब राम जन्म भूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ चुका है, तब भी पीलीभीत में भाजपा के ही सांसद और चारो विधायक हैं।