मस्जिद को लेकर मसलकी झगड़ा हो या सिलसिलों के विवाद, मुस्लिम महिलाएं इससे काफी आहत और परेशान हैं। उनका कहना है कि इस तरह बेवजह के झगड़े न सिर्फ कौम को बदनाम कर रहे हैं बल्कि उनकी जिंदगी को भी प्रभावित करते हैं। स्कूल हो या दफ्तर कहीं भी जाओ इन बातों को लेकर इतने सवाल होते हैं जिनका न तो जवाब होता है और न ही समझाने का रास्ता। ऊपर से शर्मिंदगी और उठानी पड़ती है।
फैशन डिजाइनर समयुन खान सुभाष नगर में रहती हैं। कहती हैं कि ऐसे मसलों को सड़कों पर नहीं आना चाहिए। इससे झगड़ों से लड़कियों को ज्यादा परेशानी हो रही है। जिस दिन बवाल हुआ वह इंस्टीट्यूट में थीं। सोच रही थीं घर कैसे जाएं। ऐसे हालात में घर वाले भी रोकते हैं और बच्चों को भी स्कूल भेजने से डरते हैं। पढ़ाई डिस्टर्ब होती है और महिलाओं का कई दिनों तक बाजार में आना -जाना रुक जाता है।
सुभाष नगर निवासी शिक्षिका फरजाना खान कहती हैं कि मजहबी मसला बंद कमरे में या फिर प्रशासन के जरिए हल किया जाना चाहिए। जहां तक मस्जिद का मसला है उसे कागज के अनुसार सुलझाया जाए। फिरका कोई भी हो, बस कोशिश यह रहे कि टकराव न हो। सभी की जिम्मेदारी है कि कौम को बदनाम होने से बचाएं।
मुस्तफा नगर निवासी समाजसेवी आयशा फातमा ने कहा कि मस्जिद का मसला जल्दी निपटाना चाहिए। खुदा कहता है जहां अजान न हो वहां शैतान घर कर जाता है। दिन गुजर रहे हैं और मस्जिद में अजान नहीं हो पा रही। इसकी तकलीफ भी है और त्योहार पास आने से फिक्र भी कि कोई ऐसी बात न हो कि सब बदमजा हो जाए।
सीपीएमटी की तैयारी कर रही सुभाष नगर की छात्रा अदीबा खान ने कहा कि ऐसे हालात में हर वक्त डर बना रहता है। उनका कहना है कि अगर दो दिन भी कोचिंग न जाओ तो पूरे हफ्ते भर की पढ़ाई खराब हो जाती है। वह चाहती हैं कि ऐसे मसले आपस में हल हों ताकि मस्जिद के सरकारी कब्जे में जाने की नौबत ना आए और आपसी एकता बनी रहे।